यहीं से बहस शुरू होती है।
अब मनरेगा का नाम बदला गया है—बीबी रामजी। दावा है कि इससे लोगों को 125 दिनों का काम मिलेगा। काग़ज़ पर यह राहत है, लेकिन ज़मीन पर सवाल खड़े हैं।
सवाल ये नहीं है कि नाम बदला या नहीं।
सवाल ये है कि काम मिला या नहीं?
सवाल ये है कि मजदूरी समय पर मिली या नहीं?
सवाल ये है कि 125 दिन वाकई मिलेंगे या यह भी 100 दिनों की तरह आँकड़ों में सिमट जाएगा?

राम के नाम पर राजनीति नई नहीं है।
गांधी का राम भजन में था,
और आज का राम—फाइलों, योजनाओं और भाषणों में।
कांग्रेस को दिक्कत है या नहीं—ये राजनीतिक बहस है।
लेकिन मज़दूर को दिक्कत है—ये हकीकत है।
नाम बदलने से पेट नहीं भरता,
पेट भरता है काम से।
और काम—सिर्फ़ प्रेस वार्ता से नहीं,
ज़मीन पर उतरने से मिलता है।
तो सवाल बड़ा है—
क्या बीबी रामजी योजना मज़दूर की ज़िंदगी बदलेगी,
या फिर यह भी एक नाम बनकर रह जाएगी?
सवाल पूछना ज़रूरी है,
क्योंकि लोकतंत्र में
तालियाँ नहीं—जवाब ज़रूरी होते हैं।



