लक्ष्य साफ है—
0 से 5 साल का कोई भी बच्चा छूटे नहीं।
सारण में 5 लाख 76 हजार से ज़्यादा बच्चे,
6 लाख 57 हजार घर,
1481 डोर-टू-डोर टीमें,
रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, बाजार और पुल-पुलिया तक 252 ट्रांजिट टीमें,
और नदी किनारे, स्लम, ईंट-भट्ठों में 36 मोबाइल टीमें।

सवाल सिर्फ़ दवा का नहीं,
यह भरोसे का अभियान है—
कि बीमारी नहीं, बचपन जीते।
प्रशासन कहता है—
दो बूंद ज़िंदगी की,
हर बच्चे के सुरक्षित भविष्य की ज़मानत।

और शायद यही लोकतंत्र की सबसे ज़रूरी ख़बर है—
जहाँ सुर्ख़ियों से दूर,
बचपन को बचाया जा रहा है।


