Wed. Feb 11th, 2026

रिपोर्ट — eBihar DigitalNews |
संपादक संजीव मिश्रा

यह कहानी आज से नहीं शुरू होती।
यह कहानी हर रात शुरू होती है, जब छपरा की गलियों में इंसान डरकर चलता है — और कुत्ते आज़ादी से।

अस्पताल हो या रेलवे स्टेशन, चौक हो या मोहल्ला — हर जगह एक ही नज़ारा है।
रात में अगर आप निकलें, तो पहले डरिए, फिर धीरे चलिए, फिर रुक जाइए — क्योंकि सामने पांच-सात कुत्तों की टोली है।
कभी बाइक का पीछा करते हैं, कभी बच्चों पर झपट पड़ते हैं, और कभी अस्पताल के गेट पर बैठकर मरीजों के साथ पहरा देते हैं — वो भी बिना वेतन, बिना पोस्टिंग के।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है — अब ये तमाशा बंद होना चाहिए।
7 नवंबर 2025 के आदेश में देशभर के अस्पतालों, स्कूलों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों को कुत्तों से “फ्री ज़ोन” घोषित करने की बात कही गई है।
कहा गया है — आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम भेजा जाए, नसबंदी की जाए, टीकाकरण हो, और सार्वजनिक जगहों से हटाया जाए।

कागज़ पर सब अच्छा लगता है।
पर ज़रा छपरा आ जाइए —
यहाँ मच्छर मर नहीं रहे, तो कुत्ते कहाँ से पकड़े जाएंगे?

नगर निगम ने हेल्पलाइन नंबर जारी कर दिया है —
📞 06152-242027
📞 98525-62776
कहा गया है, “कुत्ता दिखे तो फोन कीजिए, टीम पहुँचेगी।”
सवाल यह है — जब टीम कचरा उठाने नहीं पहुँचती,
तो कुत्ते पकड़ने कैसे पहुँचेगी?

छपरा के हॉस्पिटल में जाइए —
वार्ड में मरीज हैं, और बाहर गेट पर चार कुत्ते पहरेदार।
रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से पहले अगर कुछ आता है, तो वो है — कुत्तों का स्वागत दल।
गली-मोहल्लों में बच्चे स्कूल के लिए नहीं, कुत्तों से बचने के लिए दौड़ते हैं।

नगर निगम के अफसरों से पूछिए तो कहते हैं — “हम कार्रवाई करेंगे।”
लेकिन कार्रवाई कहाँ?
फागिंग मशीन महीनों से बंद है, नाले में गंदगी है, और अब जिम्मेदारी आई है कुत्तों की।
छपरा के लोग पूछ रहे हैं —
“जब इंसान के लिए आसरा नहीं, तो कुत्तों को आसरा कहाँ मिलेगा?”
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया, “कुत्तों को आश्रय स्थल में रखो।”
पर सवाल है — “कौन-सा आश्रय?”
यहाँ तो आदमी के लिए भी अस्पताल में बेड नहीं मिलता।

पर्यावरणविद और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा था —
“कुत्तों को मारना हल नहीं, उन्हें संभालना सीखिए।”
सही कहा —
पर नगर निगम न मच्छर संभाल पा रहा है, न कचरा,
तो फिर कुत्तों की बारी आएगी किस दिन?
देश में 54 लाख से ज़्यादा आवारा कुत्ते हैं।
हर शहर में वही कहानी —
बढ़ती आबादी, घटती इंसानियत, और सिस्टम का बेजान रवैया।
कुत्ते भी भूखे हैं, इंसान भी लाचार —
दोनों एक ही शहर में, बस अलग-अलग डर में जी रहे हैं।

सवाल वही है:
जब सुप्रीम कोर्ट आदेश देता है,
और ज़मीन पर नगर निगम खामोश रहता है,
तो क्या ये शहर कभी “सुरक्षित” कहलाएगा?

  • आख़िर में बस इतना ही —
    “छपरा में इंसान डरता है बाहर निकलने से,
    कुत्ते डरते हैं भूख से,
    और नगर निगम सोता है कर्तव्य से।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *