छपरा में विकास हो रहा है।
डबल डेकर बन रहा है।
सीमेंट, सरिया, मशीनें… सब अपनी रफ्तार में हैं।
लेकिन इसी रफ्तार के बीच एक सवाल खड़ा है।
सवाल 100 साल पुराना है।
जगह है—मौना फाटक, छपरा।
एक साधारण सा घर…
और उस घर की मुंडेर पर बना राम दरबार।
घर के मालिक अजय कुमार बताते हैं—
“हमारे दादाजी ने इसे बनवाया था। जो भी इस रास्ते से गुजरता, सिर झुका कर प्रणाम करता। लोगों को लगता था—अब हम छपरा में आ गए।”
सोचिए…

कोई मंदिर अगर शहर की पहचान बन जाए…
तो वो सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं रहता।
वो स्मृति बन जाता है।
वो प्रतीक बन जाता है।
छोटी सी कुटिया जैसी बनावट।
राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान।
सादगी ऐसी कि दिखावा नहीं, बस आस्था दिखती है।
अब विकास की नई रेखा खिंच रही है।
डबल डेकर उसी ज़मीन से गुज़रेगा।
और उसकी जद में आता है ये घर… और ये राम दरबार।
सवाल ये नहीं कि डबल डेकर बने या न बने।

सवाल ये है—
क्या विकास का मतलब विरासत का विस्थापन ही है?
घर के मालिक कहते हैं—
“हम चाहते हैं कि इस मंदिर को कहीं स्थापित कर दिया जाए, जहाँ लोग पूजा कर सकें।”
स्थानीय जनप्रतिनिधि प्रयासरत हैं।
मेयर से बात हुई है।
भाजपा प्रवक्ता राजेश डाबर भी चिंता जता रहे हैं।
वीरेंद्र सा मुखिया भी कह रहे हैं—हम कोशिश में हैं।
लेकिन कोशिश और निर्णय के बीच…
अक्सर फाइलें अटक जाती हैं।
यह खबर इसलिए अलग है—
क्योंकि ये सिर्फ धर्म की खबर नहीं है।
ये पहचान की खबर है।
ये शहर की स्मृति की खबर है।
क्या 100 साल की आस्था को कोई वैकल्पिक स्थान मिलेगा?
या विकास की मशीनें बिना देखे आगे बढ़ जाएँगी?”
छपरा का ये राम दरबार अब एक परीक्षा बन चुका है।
प्रशासन के लिए।
जनप्रतिनिधियों के लिए।
और हमारे लिए भी।
डबल डेकर बने।
ज़रूर बने।

लेकिन क्या इस राम दरबार को सम्मान के साथ पुनर्स्थापित किया जाएगा?
नज़र बनी रहेगी।
क्योंकि शहर सिर्फ सड़कों से नहीं बनता—
शहर यादों से बनता है।



