बिहार भर में जनसुराज का खाता भी नहीं खुला… जीरो सीट।
पर हार के ढेर में भी कुछ कहानियाँ छुपी रहती हैं—इन्हीं में से एक कहानी है जयप्रकाश सिंह की।

ये वही जयप्रकाश हैं, जो कभी भारतीय सेना में मेजर, फिर हिमाचल कैडर के सीनियर आईपीएस रहे।
यूनिफॉर्म से लेकर सिविल सर्विस तक… और अब राजनीति का मैदान।
शख़्सियत पढ़ी-लिखी, व्यक्तित्व शांत पर मजबूत—मगर चुनाव ऐसा रणभूमि है जहाँ अनुभव की नहीं, समीकरणों की जीत होती है।

छपरा में उतरे, लड़ाई लड़ी, पर जीत ना सके।
और जब हार का विश्लेषण किया—बिहार की राजनीति की वह परतें नज़र आईं, जिन्हें समझना ही मुश्किल है, बदलना तो और भी कठिन।
जयप्रकाश सिंह ने कहा—
“जनसुराज इस हालत में इसलिए पहुंचा क्योंकि राजनीति विचार से नहीं, बंटवारे और बंधुआ वोट बैंक से चलाई जा रही है। ताक़त नहीं थी उस सिस्टम को तोड़ने की, और जनता बदलाव चाहती तो सही लेकिन भरोसा नहीं कर पाई।”
पर बात यहीं खत्म नहीं होती…
इंटरव्यू के दौरान, जब उनसे सेना के दिनों पर बात हुई—उनकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई।
आतंकवाद, सीमा पर हमले, और भारत की आंतरिक सुरक्षा पर बढ़ता खतरा…
उनकी एक-एक बात सुनने लायक थी।
लगता था जैसे छपरा के बीचोबीच कोई युद्ध-मानचित्र खींचा जा रहा हो—जहाँ वे समझा रहे हों कि
देश सुरक्षा से चलता है, राजनीति से नहीं।

उन्होंने कहा—
“देश की सुरक्षा पर हमला अब सिर्फ सीमा पर नहीं, आंतरिक में भी हो रहा है। भारत को एक नई रणनीति चाहिए—जहाँ राजनीति नहीं, प्रोफेशनलिज्म चले।”
एक defeated candidate नहीं…
एक soldier, एक IPS, एक सोचने वाला नागरिक बोल रहा था।
बाकी दल जब जीत का जश्न मना रहे थे,
जयप्रकाश सिंह अपनी हार का पोस्टमार्टम कर रहे थे—
शायद इसलिए कि अगले चुनाव में जीतें या हारें,
पर देश की सुरक्षा पर बात करने वाले नेता कम होते जा रहे हैं।

पूरा इंटरव्यू सुनना चाहिए—
क्योंकि उसमें सिर्फ एक नेता की हार नहीं,
बिहार की राजनीति की बीमारी का एक्स-रे है।
