ठंड ऐसी कि हड्डियाँ जवाब दे दें।
सड़क पर निकलो तो सांस भाप बन जाए, हाथ जेब में डालो तब भी उंगलियाँ सुन्न।
गरीब, असहाय, बुजुर्ग—सबके लिए ये ठंड किसी इम्तिहान से कम नहीं।
और ऐसे वक्त में सवाल उठता है—
आम आदमी की सुध कौन ले?
यहीं पर तस्वीर में एंट्री होती है रोटरी सारण की।
स्टेशन इलाका हो या अस्पताल परिसर—
जहाँ ठंड सबसे ज़्यादा मार रही थी, वहीं अलाव जलाए गए।
कंबल बांटे गए, ताकि कोई ठिठुरता हुआ इंसान रात से हार न जाए।
बात सही है—

ये काम सरकार का है, सिस्टम का है।
लेकिन जब सिस्टम सुस्त पड़ जाए,
तो रोटरी जैसी संस्थाएं आगे आकर बता देती हैं कि
मानवता अभी ज़िंदा है।
ठंड से जूझते चेहरों पर जब कंबल की गर्माहट आई,
तो यही लगा—
आज इंसानियत ने ठंड पर थोड़ी जीत दर्ज कर ली।



