बिहार में तस्वीरें दो थीं—
एक तरफ गांधी मैदान में नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। रोशनी, कैमरे, बड़े-बड़े मंच… सत्ता का पूरा तामझाम।

और दूसरी तरफ, चंपारण के भितरवा में गांधी के उसी आश्रम में प्रशांत किशोर अकेले बैठे थे—मौन, उपवास और आत्मचिंतन में डूबे हुए।
तीन साल की पदयात्रा… गांव-गांव की धूल… हजारों किलोमीटर… और जनता का एक सीधा, साफ संदेश—“इस बार नहीं।”

राजनीति में जीत-हार की ख़बरें तो रोज़ आती हैं, पर मौन की ख़बर कम मिलती है।
और आज बिहार में यही हुआ—
सत्ता के शोर के सामने एक आदमी का मौन, ज़्यादा बोलता हुआ दिखा।


