सारण ज़िले के मांझी थाना क्षेत्र से आई यह ख़बर… दुख, डर और हैरानी—तीनों को एक साथ खड़ा कर देती है।
दक्षिण टोला का एक घर…
अकेले रहने वाले 55 वर्षीय सूरज प्रसाद…
और उनकी मौत—एक ऐसी बर्बरता की कहानी, जिसे सुनकर मन सवाल करता है:
क्या हमारी संवेदनाएँ सचमुच खत्म हो चुकी हैं?
सूरज प्रसाद की हत्या जिस क्रूर तरीके से की गई है…
वह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि इंसानियत पर किया गया सबसे गहरा वार है।
प्राइवेट पार्ट को भी निकाल लिया गया है…
शरीर पर गंभीर निशान हैं…
और संभावना जताई जा रही है कि उनकी आंखों में तेज़ाब डाला गया।

ये संकेत बताते हैं कि हत्या सिर्फ हत्या नहीं थी—
यह किसी गहरी दुश्मनी, किसी चोटिल अहंकार या किसी छिपे रहस्य की दास्तान भी हो सकती है।
सवालों की लिस्ट लंबी है…
और जवाब—अभी तक कहीं नहीं।
सूचना मिलते ही मांझी थाना पुलिस, एकमा सीडीपीओ और एफएसएल टीम मौके पर पहुंचती है।
सबूत इकट्ठा किए जाते हैं…
जांच शुरू होती है…
लेकिन गांव में फैली सन्नाटा और चर्चाएँ—दोनों तेज हैं।
परिवार के लोग कहते हैं—
“हमें नहीं पता किसने और क्यों मारा… वह अकेले रहते थे… खेती-किसानी करते थे…”
गांव में अवैध संबंध वाला कोण भी चर्चा में है।
पुलिस इस संभावना की जांच कर रही है, लेकिन अभी कुछ भी साफ नहीं।

शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।
जांच कई दिशाओं में चल रही है।
क़ानून अपना काम कर रहा है, लेकिन गांव में एक डर बैठ गया है…
एक ऐसा डर जो बताता है कि कोई अकेला इंसान भी कितनी बड़ी हिंसा का निशाना बन सकता है।
यह कहानी सिर्फ एक हत्या की नहीं है—
यह उस समाज की कहानी है जो हिंसा की खबरें सुनते-सुनते इतना थक चुका है कि अब दर्द भी धीरे बोलता है।
और इसी दर्द के बीच छिपा है वो सवाल—
क्या इंसान सच में इंसान रह गया है?

