मांझी विधानसभा का एक छोटा-सा गांव।
जब हम वहां पहुंचे,
तो घरों के पास बच्चों की हल्की-हल्की रोने की आवाज,
चिड़ियों की चहचहाहट,
और मिट्टी की खुशबू महसूस हो रही थी।

लगा जैसे वक्त यहीं ठहर गया हो —
कोई भागदौड़ नहीं, कोई शोर नहीं,
बस सुकून, जो अब शहरों में नहीं मिलता।
हमने लोगों से पूछा —
आपको सरकार से क्या मिला?

किसी ने कहा — राशन मिलता है, पर काम नहीं है।
किसी ने कहा — सड़क बनी है, पर अस्पताल दूर है।
एक बुज़ुर्ग किसान बोले —
बिजली तो आ गई, पर रोज़गार नहीं आया।
सुनकर लगा, विकास की रफ़्तार आई ज़रूर है,
मगर ज़िंदगियां अब भी पीछे छूट गई हैं।

यहां के लोगों की आंखों में एक ही बात साफ दिखी —
उम्मीद अभी भी जिंदा है।
गरीबी है, तकलीफ़ें हैं,
मगर चेहरे पर मुस्कान है।
उन्हें यकीन है कि एक दिन
उनके बच्चे स्कूल जाएंगे,

पर सपनों तक पहुंच अब भी अधूरी है।
ये गांव कहता है —
हम गरीब हैं, पर उम्मीद जिंदा है।
और शायद यही भारत की असली ताकत है —
जिंदा रहना और उम्मीद बनाए रखना।
