पटना की एक शांत दोपहर में, कैमरों की तेज़ रोशनी के बीच, प्रशांत किशोर खड़े थे—एक राजनीतिक हार की किताब अपने हाथ में लिए हुए। उन्होंने कहा कि “हम व्यवस्था परिवर्तन नहीं कर सके, और इसकी जिम्मेदारी मेरी है।”
राजनीति में लोग अक्सर हार को जनता, कार्यकर्ताओं, मौसम या “संगठन की कमजोरी” पर डाल देते हैं, लेकिन PK ने सीधे-सीधे अपने ऊपर लिया।
अब यह जिम्मेदारी नहीं, एक तरह का स्वीकारोक्ति-पत्र था।
उन्होंने घोषणा की कि 20 नवंबर को भीतिहरवा गांधी आश्रम में एक दिन का मौन उपवास रखेंगे। चुनाव का विश्लेषण तो सब करते हैं, पर उपवास और प्रायश्चित—यह आजकल राजनीति में नया शब्दकोश है।

“अभिमन्यु को घेरकर मारा गया, लेकिन जीत पांडवों की हुई…”
राजनीति छोड़ने के सवाल पर PK ने महाभारत का उदाहरण दिया।
उनके शब्दों में दर्द भी था और चुनौती भी—
“हम बिहार छोड़कर नहीं जाएंगे। तीन साल की मेहनत की है, अब दोगुनी मेहनत करेंगे। पीछे हटने का सवाल ही नहीं।”
जैसे कोई घायल योद्धा कह रहा हो—
“मैं मैदान छोड़कर नहीं जाऊँगा।”
सबसे बड़ा आरोप—40 हजार करोड़ का ‘चुनावी चक्रव्यूह’
PK ने चुनाव में पैसे बांटने का मुद्दा उठाया।
कहा कि—
“बिहार में इतिहास में पहली बार सरकार ने करीब 40,000 करोड़ रुपए बांटने का वादा किया। हर विधानसभा में 60–62 हजार महिलाओं को 10 हजार रुपए दिए गए। अब अगले 6 महीने में 2 लाख रुपए भी दीजिए, नहीं तो यह साफ हो जाएगा कि वोट खरीदे गए हैं।”
उन्होंने एक नंबर भी जारी किया—
9121691216
और चुनौती दी—
“अगर डेढ़ करोड़ महिलाएँ 2 लाख नहीं पाती हैं, तो फोन कीजिए। हम ऑफिस तक ले जाएंगे। आपकी लड़ाई हमारी लड़ाई है।”

यह सीधे-सीधे सरकार पर सबसे बड़ा सवाल है—
“अगर यह चुनावी लाभांश नहीं था, तो अगले छह महीने में 2-2 लाख क्यों नहीं मिलेंगे?”
आत्मचिंतन की राजनीति बनाम जाति की राजनीति
PK ने कहा—
“हमने मुद्दों की राजनीति की। जाति-धर्म वाले जीते हैं। यह उनकी जीत है, लेकिन हिसाब तो उन्हें देना होगा।”
यही वाक्य बिहार की राजनीति का आइना है।
जो लोग जाति का समीकरण बनाते हैं, उनकी गाड़ी चल जाती है।
जो मुद्दों की बात करते हैं, उन्हें रास्ता नहीं मिलता।
लेकिन आज PK ने इसी राजनीति को चुनौती देने की कोशिश की।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौन, सवाल और संकल्प
स्टेज पर PK के साथ जन सुराज के तमाम नेता बैठे थे—
मनोज भारती, KC सिन्हा, वाईवी गिरी, अफाक आलम, विनीता मिश्रा…
लेकिन जवाब अकेले PK दे रहे थे।
लग रहा था जैसे यह एक पार्टी नहीं,
एक व्यक्ति का आत्ममंथन हो रहा हो।
और शायद यही जन सुराज की सबसे बड़ी लड़ाई है।

आखिर में…
चुनाव हार गए, लेकिन सवाल जीत गए।
PK पीछे नहीं हटे—ये भी जीत का ही एक रूप है।
राजनीति में अगर कोई हार को अपना मान ले,
और जीत की जिम्मेदारी जनता पर छोड़ दे—
तो समझिए कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
और PK की कहानी…
लगता है अभी लंबी चलेगी।

