छपरा का मेथवलिया चौक, जहां फोरलेन चमक रहा है… सरकार के विज्ञापन की तरह। लेकिन इसी चमक के बीच, ट्रकों का धुआं, रफ्तार और लापरवाही मिलकर एक ऐसा धुंध का पर्दा बनाते हैं… जिसके पीछे मोटरसाइकिल सवार अपनी जान रोज़ दांव पर लगाते हैं।

बिहार में 15 करोड़ आबादी, और 10 करोड़ से ज़्यादा मोटरसाइकिलें। पर सड़कें—ट्रकों के लिए चौड़ी, कारों के लिए बेहतर… और बाइकों के लिए? सिर्फ किस्मत के भरोसे चलने की जगह।
सरकार टू लेन को फोरलेन और सिक्स लेन कर लेती है, लेकिन सवाल वही—
क्या मोटरसाइकिल चलाने वालों की कोई अलग सड़क नहीं होनी चाहिए?
जो सबसे ज़्यादा सफर करते हैं… वही सबसे ज़्यादा मरते क्यों हैं?

आज फिर मेथवलिया चौक के पास 23 वर्षीय कमल किशोर कुमार मौत के अंधेरे में समा गया। ट्रक ने रफ्तार में उसे कुचल दिया।
हॉस्पिटल ले जाने के रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया।
उसका चचेरा भाई अमित कुमार, जो बाइक चला रहा था, बच तो गया… लेकिन अपने ही भाई को खो देने का दर्द उसकी आंखों में ठहर गया है।
दुर्घटना के बाद ट्रक का चालक भाग गया…
और घरों में मातम उतर आया — परसागढ़ गांव में।
पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लिया, पोस्टमार्टम कराया… और फिर फाइलों में एक और केस दर्ज हो गया। लेकिन सड़क की ये मौतें… सिर्फ कागज़ पर दर्ज नहीं होतीं, ये हर गांव में, हर घर में, एक कहानी बनकर फैलती हैं — अधूरी, अचानक, और दर्दनाक।

सवाल वही है…
छपरा हो या पटना — क्या बिहार की सड़कों पर बाइक चलाना सिर्फ किस्मत का खेल है?
जब तक बाइकों के लिए अलग सुरक्षित लेन नहीं बनेगी… तब तक ये मौतें यूँ ही चलती रहेंगी।
यह आवाज़… सिर्फ खबर नहीं।
यह चेतावनी है।
क्योंकि अगला नंबर… किसी का भी हो सकता है।

