छपरा की अदालत आज कुछ अलग है…
यहां आज न जज की सख़्ती है, न वकीलों की लंबी बहस।
यहां आज समझौते की मेज़ सजी है,
यहां आज फैसले नहीं, फाइलें बंद हो रही हैं।
हम बात कर रहे हैं राष्ट्रीय लोक अदालत की —
यानी जनता की अदालत।
यहां न कोई हारता है, न कोई जीतता है,
यहां जीत होती है सुकून की।
छोटे-बड़े विवाद, सालों से अटकी फाइलें,
आपसी रज़ामंदी से सुलझाई जाती हैं।
एक दस्तख़त, एक मुस्कान…
और मुक़दमे की कहानी यहीं खत्म।

पिछले क्वार्टर में छपरा में
करीब 700 मामलों का निपटारा हुआ था।
और इस बार उम्मीद है कि
1000 से ज़्यादा केस सुलझाए जाएंगे।
इसी उम्मीद के साथ
आज छपरा न्यायालय परिसर में
भीड़ उमड़ी है, भरोसा उमड़ा है।
बुज़ुर्ग, युवा, महिलाएं —
हर चेहरे पर एक ही सवाल,
“आज शायद मामला यहीं खत्म हो जाए।”

लोग कह रहे हैं —
लोक अदालत से इंसाफ़ जल्दी मिलता है,
पैसा भी बचता है और समय भी।
तो आखिर
इस जनता की अदालत का मक़सद क्या है?
लोग क्यों भरोसा कर रहे हैं?
इन्हीं सवालों पर
लोक अदालत के सचिव ब्रजेश कुमार
क्या कहते हैं —
सुनिए उन्हीं की ज़ुबानी।


