कुतुब दियारा में आज एक नाम बार-बार गूंजता रहा— भिखारी ठाकुर।
लोक, भाषा और समाज की आवाज़ रहे भिखारी ठाकुर की जयंती पर वही लोग जुटे, जो सत्ता, प्रशासन और संस्कृति की अलग-अलग कुर्सियों पर बैठे हैं।
कार्यक्रम का मंच था— श्री भिखारी ठाकुर आश्रम, कुतुब दियारा।
मुख्य अतिथि के रूप में पहुँचे बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खां।
गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया, माल्यार्पण हुआ, दीप जला… रस्में पूरी हुईं।

लेकिन सवाल यही है—
क्या भिखारी ठाकुर सिर्फ माल्यार्पण तक सिमट गए हैं?
राज्यपाल ने प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए, दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना से हुई और समापन राष्ट्रगान से।
बीच में लोक-संस्कृति की झलक थी, वही संस्कृति जिसे भिखारी ठाकुर ने मंच से गाँव-गाँव तक पहुँचाया था।

मंच पर थे—
विधान पार्षद वीरेंद्र नारायण यादव,
गरखा विधायक सुरेंद्र राम,
जिला परिषद अध्यक्ष जयमित्रा देवी,
भिखारी ठाकुर के पौत्र सुशील कुमार ठाकुर,
सारण डीआईजी निलेश कुमार,
प्रभारी जिलाधिकारी सह नगर आयुक्त सुनील कुमार पांडे,
एसएसपी डॉ. कुमार आशीष,
और कई अधिकारी व गणमान्य अतिथि।

पर भिखारी ठाकुर को याद करते हुए एक सवाल हवा में तैरता रहा—
जिन्होंने भोजपुरी को मंच दिया, दलितों-पिछड़ों की पीड़ा को नाटक बनाया,
क्या उनकी विरासत आज भी ज़मीन पर ज़िंदा है
या फिर साल में एक दिन फूल चढ़ाने तक सीमित रह गई है?
भिखारी ठाकुर जयंती सिर्फ उत्सव नहीं,
यह आईना है—
हमारी राजनीति, हमारी संस्कृति और हमारी संवेदनशीलता का।

