छपरा का सदर अस्पताल…
एक बार फिर सुर्खियों में है।
सुर्खियां किसी उपलब्धि की नहीं,
सुर्खियां एक नवजात की मौत की हैं।
कई हजार करोड़ रुपये की लागत से बना यह अस्पताल,
जहां शीशे के केयर यूनिट हैं,
नवजातों के लिए आधुनिक सिस्टम हैं,
जहां हर दीवार पर “बेहतर स्वास्थ्य सेवा” का दावा लिखा है—
आज उसी अस्पताल से एक सवाल निकलकर आया है…
क्या इमारतें ही अस्पताल होती हैं, या इंसान भी ज़रूरी होते हैं?
तीन दिन पहले इसी सदर अस्पताल में एक बच्चे ने जन्म लिया।
नाम रखा गया— नीतीश कुमार,
मुख्यमंत्री के नाम पर,

शायद इस भरोसे के साथ कि सिस्टम नाम की तरह मजबूत होगा।
डॉक्टरों ने बच्चे को स्वस्थ बताया।
मां-बाप को घर भेज दिया गया।
लेकिन किसे पता था कि यह भरोसा,
कुछ घंटों में मातम में बदल जाएगा।
देर रात,
बच्चे को सांस लेने में दिक्कत होने लगी।
परिजन घबराकर फिर अस्पताल पहुंचे।
लेकिन उस वक्त अस्पताल में
कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था।
नर्स ने बच्चे को देखा,
बिस्तर पर लिटाया,
और कह दिया—
“बच्चा ठीक है, घर ले जाइए।”
परिजन घर लौटे।
और आधे घंटे के भीतर…
तीन दिन के उस बच्चे की मौत हो गई।
अब सवाल उठता है—
अगर बच्चा ठीक था,
तो आधे घंटे में उसकी सांस क्यों थम गई?
परिजनों का आरोप है—
यह मौत नहीं, घोर लापरवाही है।
लापरवाही डॉक्टर की,
लापरवाही नर्स की,

और लापरवाही पूरे अस्पताल प्रशासन की।
बच्चे के पिता श्रवण कुमार,
महम्मद चौक के पास के रहने वाले हैं।
परिजन जयप्रकाश बताते हैं—
“हम उम्मीद लेकर आए थे,
पर यहां तो सिस्टम ही बीमार मिला।”
करोड़ों रुपये खर्च कर
नवजात देखभाल के लिए
एनआईसीयू, केयरटेकर सिस्टम,
शीशे के केबिन बनाए गए हैं।
लेकिन परिजनों का कहना है—
सिस्टम कागजों में है, ज़मीन पर नहीं।
अब सवाल सिर्फ एक बच्चे की मौत का नहीं है।
सवाल यह है—
जब जरूरत के वक्त डॉक्टर नहीं मिलता,
तो ऐसे अस्पताल किस काम के?
सिविल सर्जन को आवेदन दिया गया है।
जांच की मांग हुई है।
लेकिन सवाल यह है—
क्या जांच से बच्चे की सांस लौटेगी?
या यह मामला भी
फाइलों में दबा दिया जाएगा?
छपरा का सदर अस्पताल फिर सुर्खियों में है।
और इस बार सुर्खी की कीमत—
एक नवजात की ज़िंदगी है।

