मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समृद्धि यात्रा पर सारण पहुँचे।
छपरा के मंच से एक वाक्य बार-बार दोहराया गया—
“2005 से पहले आपको याद होगा, हाल क्या था।”
याद वाकई है।
सारण ही नहीं, बिहार के कई हिस्सों में तब डर था, अंधेरा था, अव्यवस्था थी।
आज मुख्यमंत्री कहते हैं—विकास है।

और विकास की एक लंबी सूची सुनाई जाती है।
इंजीनियरिंग कॉलेज है, पॉलिटेक्निक है,
महिला आईटीआई है, मेडिकल कॉलेज है।
पुल हैं, पुलिया हैं,
छपरा–मुजफ्फरपुर सड़क चौड़ी है,
एलिवेटेड रोड बनने वाली है,
चार ओवरब्रिज शुरू होने वाले हैं।
कागज़ पर यह तस्वीर काफ़ी मजबूत लगती है।
लेकिन सवाल कागज़ से नीचे उतरकर ज़मीन पर खड़े होते हैं।
कॉलेज तो हैं—

पर पढ़ाई की गुणवत्ता कैसी है?
अस्पताल बने हैं—
पर इलाज आम आदमी को कितना सुलभ है?
सड़कें बनी हैं—
पर क्या सड़क के साथ रोज़गार भी उतनी ही तेज़ी से पहुँचा?
मुख्यमंत्री कहते हैं—
अब सात निश्चय-3 आएगा।
यानि विकास का अगला अध्याय।
लेकिन जनता पूछती है—
पहले निश्चयों का असर उसकी ज़िंदगी में कितना दिखा?
क्योंकि विकास सिर्फ़ पुल और भवन नहीं होता,
विकास तब होता है

जब आदमी बिना डर, बिना कर्ज़ और बिना मजबूरी के
अपनी ज़िंदगी चला सके।
सारण में घोषणाएँ बड़ी हैं।
इरादे भी बड़े बताए जा रहे हैं।
अब परीक्षा यह है कि
घोषणा और हकीकत के बीच की दूरी
कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से कम होती है।
यही असली सवाल है।



