कभी-कभी
ज़िंदगी को ज़ोर से नहीं…
धीरे से सुना जाता है।
कभी-कभी
शोर से दूर जाकर
खामोशी से मुलाक़ात करनी पड़ती है।
और कभी-कभी
लौटना पड़ता है
उसी जगह…
जहां से हमने
सब कुछ छोड़ दिया था।
चलिए…

आज आपको लिए चलते हैं
छपरा शहर से महज़ चार किलोमीटर दूर,
एक ऐसी दुनिया में
जहां इंसान मेहमान है
और पक्षी राजा हैं।
इसे आप पक्षी विहार कहिए,
पक्षी आनंद विहार कहिए,
या फिर यूँ कह दीजिए —
कौवा बिहार।
यह कोई अतिशयोक्ति नहीं…
यह सच्चाई है।

इस जगह का नाम है आनंद विहार,
और यहीं स्थित है
लंगेश्वरी बाबा स्थान, बिशुनपुरा।
यहां खड़ा है
सैकड़ों साल पुराना बरगद का पेड़,
जिसकी छांव में
समय भी थोड़ी देर ठहर जाता है।
चारों तरफ़
ना हॉर्न की आवाज़,
ना मशीनों का शोर…
बस हवा है,
और आसमान में

हज़ारों कौवों की उड़ान।
जैसे ही कोई यहां
सत्तू या दाना अर्पित करता है,
आसमान अचानक
ज़िंदा हो उठता है।
हज़ारों की संख्या में
कौवे उतर आते हैं…
और लगता है
मानो प्रकृति कह रही हो —
“अभी सब खत्म नहीं हुआ है।”
आज जब शहरों में
कौवा दिखना भी
किस्मत की बात हो गई है,
यहां करीब दस हज़ार कौवे
अब भी सुरक्षित हैं।
याद है आपको
गांव की वो सुबहें?
जब दिन की शुरुआत
दो आवाज़ों से होती थी —
एक मुर्गे की बाँग,
और दूसरी
कौवे की काँव-काँव।
कौवा अगर छत पर बोलता था,
तो कहा जाता था —
“कोई आने वाला है…”
कौवा सिर्फ़ पक्षी नहीं था,
वो संकेत था,
वो संदेश था,
वो हमारी लोक-कथाओं का हिस्सा था।
लेकिन हमने
अपनी तरक़्क़ी की जल्दी में
पेड़ों को काट दिया,
आसमान को छोटा कर दिया,
और पक्षियों को
धीरे-धीरे
खामोश कर दिया।
आज पक्षी
लुप्त होने की कगार पर हैं…

और कौवा
शहरों से ग़ायब होता जा रहा है।
आनंद विहार
हमें याद दिलाता है
कि अगर चाहें
तो अब भी
वापसी मुमकिन है।
बस इतना करना होगा
कि हम प्रकृति को
दोबारा सुनना सीख लें।
क्योंकि
एक दिन हम सब
इस शोर से थक जाएंगे…
और तब दिल कहेगा —
“चलो… लौट चलें।”
उस ज़िंदगी की ओर
जहां
पेड़ सांस लेते हैं,
पक्षी बोलते हैं,
और इंसान
सिर्फ़ सुनता है।
छपरा के पास स्थित
आनंद विहार

सिर्फ़ एक जगह नहीं…
यह एक सवाल है —
कि हम किस दुनिया को चुनेंगे?

