छपरा की तस्वीर, स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल!
इस तस्वीर को देखकर आप क्या सोचेंगे? एक आदमी बीमार है। जिंदगी बचाने के लिए उसे अस्पताल ले जाया जा रहा है। लेकिन एंबुलेंस की जगह सहारा बना है एक ई-रिक्शा।
ई-रिक्शा पर ऑक्सीजन सिलेंडर रखा है। मरीज को ऑक्सीजन दी जा रही है। परिवार के लोग उसे राहत देने के लिए हाथ से पंखा झल रहे हैं। कोई नहीं जानता कि अस्पताल पहुंचने तक उसकी हालत कैसी रहेगी।
यह वीडियो रास्ते में बनाया गया है, जब भोला महतो को उनके परिजन तरवार गांव, प्रखंड अमनौर से छपरा अस्पताल ले जा रहे थे।
बताया जा रहा है कि एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण परिवार को मजबूरी में ई-रिक्शा का सहारा लेना पड़ा।
अब जरा सोचिए, जिस परिवार के सामने अपने आदमी की जिंदगी बचाने की चुनौती हो, उसके लिए उस वक्त हर एक मिनट कितना कीमती होगा!
सवाल है कि आखिर जरूरत के समय एंबुलेंस क्यों नहीं मिली? क्या परिवार को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से समय पर मदद नहीं मिलनी चाहिए थी?
अमनौर सारण लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, जहां से सांसद राजीव प्रताप रूडी आते हैं। लेकिन यह सवाल किसी एक नेता तक सीमित नहीं है। सवाल उस पूरी व्यवस्था से है, जहां आम आदमी को आपात स्थिति में बुनियादी सुविधा के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है।

हम विकास की बातें करते हैं, अस्पतालों की बातें करते हैं, स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के दावे सुनते हैं। लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर तब सामने आती है, जब किसी की सांसें संकट में हों और उसका परिवार उसे बचाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा हो।
यह तस्वीर सिर्फ भोला महतो के परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि एक जरूरी सवाल है—अगर वक्त पर एंबुलेंस ही नहीं मिले, तो स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों का आम आदमी क्या करे?
इस मामले में एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने के कारणों की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। भोला महतो की हालत और उन्हें आगे मिली चिकित्सा सहायता की जानकारी भी सामने आनी चाहिए।
आप इस तस्वीर को देखिए और अपनी राय बताइए। क्या हमारे स्वास्थ्य तंत्र को ऐसी तस्वीरों से सवाल नहीं पूछने चाहिए?
eBihar Digital News

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