छपरा…
सिर्फ एक शहर नहीं,
यह समय की तहों में दबा हुआ इतिहास है।
धर्मनाथ मंदिर के आगे…
बूटी मोड़ पड़ता है…
और वहीं, भीड़ के शोर और वाहनों की आवाज़ों के बीच
चुपचाप खड़ा है —
अन्नपूर्णा मंदिर, छपरा।
एक ऐसा मंदिर…
जिसकी दीवारें बोलती हैं

📜 1334 ईस्वी…
इतिहास के पन्ने पलटिए —
उस समय दिल्ली की सल्तनत पर शासन था
मुहम्मद बिन तुगलक का।
जब राजधानी बदलने के प्रयोग हो रहे थे,
जब साम्राज्य की सीमाएँ खिंच रही थीं…
उसी दौर में छपरा की इस धरती पर
मां अन्नपूर्णा का यह मंदिर खड़ा हो रहा था।

सोचिए…
लगभग 700 साल पुरानी विरासत।
🌾 मां अन्नपूर्णा…
माता पार्वती का ही एक रूप।
अन्न की देवी।
पोषण की शक्ति।
वाराणसी में उनका प्रसिद्ध धाम है —
अन्नपूर्णा देवी मंदिर, वाराणसी।
इंदौर में भी अन्नपूर्णा मंदिर है —
अन्नपूर्णा मंदिर, इंदौर।
लेकिन छपरा का यह मंदिर…

अपनी ही मिट्टी में उपेक्षित खड़ा रहा।
पुराना छपरा…
कभी यही मुख्य बस्ती हुआ करती थी।
समय आगे बढ़ा… शहर फैल गया…
पर इतिहास पीछे छूट गया।
दीवारों की दरारें पूछती हैं —
क्या हमने अपनी जड़ों को भुला दिया?

“दीवारों पर उभरी दरारें ये कह रही हैं,
कभी हम भी इबादत का उजाला हुआ करते थे।
अब धूल में ढंके हैं, मगर याद रखो —
हम भी कभी इस शहर का हाला हुआ करते थे…”
गर्भगृह के भीतर…
सुर्खी-चूने की बनी दीवारें…
एक पत्थर…
जिस पर उकेरा हुआ साल — 1334।
इतिहास चिढ़ाता है हमें —
“तुम विरासत की बातें करते हो,
और विरासत को ही भूल जाते हो…”
लेकिन…
अब तस्वीर बदल रही है।
छपरा के सामाजिक दायित्व निभाने वाले लोगों ने
इस मंदिर के पुनर्निर्माण का बीड़ा उठाया है।
करीब 3.5 करोड़ का प्रस्तावित बजट।
नाम होगा — “अन्नपूर्णा धाम”।
संयोजक अरुण पुरोहित,
महापौर, उपमहापौर,
राहुल मेहता, दीपक गुप्ता…
और कई अनजाने चेहरे —
जिन्होंने कहा,
“इतिहास को गिरने नहीं देंगे।”
कहा जाता है,
यह धरती ऋषियों की तपोभूमि रही।
लोकमान्यता है कि त्रेता युग में
भगवान राम का मार्ग इस क्षेत्र से गुज़रा होगा।
इतिहास प्रमाण खोजता है…
पर आस्था अनुभव से चलती है।

“कोशिश करने वालों की हार नहीं होती,
धूल जमी हो चाहे सदियों की —
पर विरासत कभी बेकार नहीं होती…”
आज सवाल सरकारों से भी है,
और समाज से भी।
सरकारें आईं…
सरकारें गईं…
पर यह मंदिर खामोश खड़ा रहा।
अब अगर समाज जागा है,
तो शायद मां की कृपा से
यह मंदिर फिर जगमगाएगा।
धर्मनाथ मंदिर के आगे…
बूटी मोड़ से जब अगली बार गुज़रें…
तो एक बार रुकिएगा।
देखिएगा…
यह सिर्फ एक मंदिर नहीं,
यह छपरा की आत्मा है।
और शायद…
700 साल बाद
यह आत्मा फिर से प्रकाश में लौटने वाली है।

