अमनौर–तरैया मुख्य मार्ग पर
स्कूली वैन और स्कॉर्पियो की जोरदार टक्कर हुई।
और कुछ सेकंड में हँसते-खेलते बच्चे
खून से लथपथ हो गए।

एक दर्जन से ज्यादा बच्चे घायल,
जिनमें 4–5 की हालत बेहद गंभीर बताई जा रही है।
कुछ को छपरा सदर अस्पताल और
5–6 बच्चों को पटना पीएमसीएच रेफर किया गया है।

सुबह के समय —
जैसे हर घर में होता है,
बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजा गया…
माताएँ टिफ़िन रख रही थीं,
पिता साइकिल–बाइक निकालकर इंतज़ार कर रहे थे…
किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि
स्कूल की वैन आज घर नहीं लौटेगी,
अस्पताल पहुँचेगी।

टक्कर इतनी भीषण थी कि स्कूली वैन का आगे का पूरा हिस्सा चकनाचूर हो गया।
सड़क पर बिखरी किताबें, टूटे बैग, फटे जूते,
और वह सन्नाटा —
जो आदमी के दिल को चीर दे।

ग्रामीणों ने देर होने का इंतज़ार नहीं किया।
स्वयं बच्चों को अस्पताल पहुँचाया।
इसी बीच गुस्सा भी भड़का —
सड़क जाम हुआ, लोग विरोध में उतर आए।
क्योंकि इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद भी प्रशासन देर से पहुंचा।
माँ-बाप अस्पतालों में चीख रहे हैं —
किसी के बच्चे को ऑक्सीजन लग रहा है,
किसी के सिर पर टांके लगाए जा रहे हैं,
और कोई अपने बच्चे को स्ट्रेचर पर देख कर बेहोश हो जा रहा है।
सवाल आज फिर वही है —
👉 क्या स्कूल जाने वाले बच्चे सड़क पर सुरक्षित नहीं हैं?
👉 रफ्तार और लापरवाही का खामियाज़ा हमेशा मासूमों को ही क्यों उठाना पड़ता है?
यह केवल एक हादसा नहीं है,
यह सिस्टम की नाकामी है।
अगर ट्रैफिक निगरानी ठीक होती,
अगर स्कूल वाहनों की जांच होती,
तो शायद आज इतने घरों में चूल्हे नहीं बुझते।
हम प्रार्थना करते हैं —
हर बच्चा सुरक्षित लौटे,
हर परिवार की गोद भरी रहे।
लेकिन दुआ के साथ सवाल भी ज़रूरी है —
आख़िर कब तक?
