Wed. Feb 11th, 2026

बिहार…
30 साल का इंतज़ार।
तीन दशक की चुप्पी।
और इन तीन दशकों में,
एक-एक कर बंद होती चीनी मिलें…
और उन मिलों के साथ बंद होते सपने।”
आज बिहार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है,
जहाँ एक उम्मीद की कमजोर लौ…
सरकार के नए फैसले से
थोड़ी तेज़ होती दिख रही है।
2025 में भारी बहुमत से जीतने के बाद
बिहार सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में
एक साहसिक घोषणा की गई—
बिहार की 9 चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने की कोशिश शुरू।

मढ़ौरा…
चनपटिया…
सकरी…
मोतिहारी…
दरभंगा…
मुज़फ्फरपुर…
नाम तो वही हैं,
पर हालत… किसी कब्रिस्तान से कम नहीं।

उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री सम्राट चौधरी कहते हैं—
“1 साल में मढ़ौरा की चीनी मिल चालू कर देंगे।”
बयान बड़ा है…
सपना और बड़ा।
और जनता की उम्मीद… उससे भी बड़ी।

पर सवाल वहीं हैं।
सवाल हमेशा की तरह कड़े हैं।
और कभी-कभी कड़वे भी—
❗ सवाल नंबर 1

क्या आप लोगों की भावनाओं पर राजनीति नहीं कर रहे?
30 सालों से बंद मिलें…
जिन्हें लोग अब सिर्फ खंडहर के रूप में जानते हैं।
❗ सवाल नंबर 2
इतना बड़ा जनादेश देकर जनता पूछती है—
हमारी उम्मीदें छोटी क्यों हों?
❗ सवाल नंबर 3

मढ़ौरा और चनपटिया की मिलें…
जिन्हें स्क्रैप की तरह बेच दिया गया,
लोहे तक को उखाड़कर ले गए।
क्या वो सच में चालू हो सकती हैं?
या फिर नए सिरे से ही सब कुछ बनाना पड़ेगा?

❗ सवाल नंबर 4

सरकार जवाब दे—
“खंडहर से चीनी कैसे निकलेगी?”
❗ सवाल नंबर 5

गन्ना किसान…
अब ईख नहीं उगाते।
कई पंजाब चले गए…
कई दिल्ली…
कई गल्फ।
गाँवों में सिर्फ बुज़ुर्ग बचे हैं।

❗ सवाल नंबर 6

इन्वेस्टर्स आएंगे?
बैंक लोन देंगे?
और अगर देंगे भी…
तो फैक्ट्री कौन चलाएगा?

❗ सवाल नंबर 7

जहाँ मिलें थीं,
वहाँ आज अवैध कब्जे की नई बस्तियाँ खड़ी हैं।
क्या सरकार पहले उन्हें हटाएगी?

❗ सवाल नंबर 8

गन्ना किसान को बीज, खाद, ऋण, सिंचाई…
कौन देगा?
कैसे देगा?

❗ सवाल नंबर 9

जो मिलें अभी चल भी रही हैं…
उनकी हालत भी ICU में है।
पहले उन्हें बचाएँगे या नई मिलें खोलेंगे?

लेकिन…
सवालों की इस लंबी सूची के बीच,
एक छोटी-सी रोशनी भी है।

अगर सरकार ने सच में यह कोशिश शुरू कर दी,
तो 5 साल बाद बिहार की तस्वीर बदलेगी।
पलायन रुकेगा।
गाँवों में फिर से ईख झूमेगी।
और बूढ़े हो चुके सपनों में
थोड़ी नई चमक लौट आएगी।
युवा आँखें जो आज बेरोज़गारी और पलायन की धूल में धुँधली हो चुकी हैं…
उनमें उम्मीद की एक चिंगारी फिर जग सकती है।

जनता कहती है—
“हमने आपको अभूतपूर्व जनादेश दिया है…
अब गेंद आपके पाले में है।”
हमारी बारी अगली बार आएगी।
पर आज—
सवाल और उम्मीद…
दोनों आपके सामने रख दिए हैं।

“चलो… शुरुआत तो हुई है।
अब देखते हैं—
बिहार का सपना सच होता है,
या फिर एक और चुनावी कहानी बनकर रह जाता है…

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