मांझी थाना क्षेत्र…
चकिया गांव…
और एक ताबूत में लिपटा तिरंगा…
यह कहानी है हवलदार जयप्रकाश यादव की।
कहते हैं, वह 2011 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। कश्मीर के पुंछ-राजौरी सेक्टर में तैनात थे। एक विशेष सर्च ऑपरेशन के दौरान उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आया… कोमा में चले गए… और दो दिन पहले उनके शहीद होने की खबर गांव तक पहुंची।

खबर आई… और पूरा इलाका जैसे कुछ पल के लिए थम गया।
घर में बूढ़े पिता — इंद्रदेव यादव — जो पहले से बीमार हैं।
एक बड़ा भाई… जो सड़क दुर्घटना में पहले ही दुनिया छोड़ चुका है।
एक मां… जिसकी आंखें अब भी दरवाज़े पर टिक जाती हैं।
एक पत्नी… जो रोते-रोते शायद अब थक चुकी है।
और दो छोटे बच्चे —
एक बेटा… सिर्फ दो साल का।

एक बेटी… चार साल की।
उन्हें अभी समझ नहीं है कि “शहीद” शब्द का मतलब क्या होता है।
लेकिन गांव समझता है।
इलाका समझता है।
जैसे ही पार्थिव शरीर पैतृक गांव पहुंचा…
तिरंगे में लिपटा हुआ…
100 मीटर से भी लंबा तिरंगा लेकर युवा सड़कों पर उतर आए।
नारे गूंज रहे थे —
“जयप्रकाश यादव अमर रहें!”
हजारों की भीड़…
बुजुर्ग… महिलाएं… बच्चे…
सबकी आंखें नम थीं।

ताबूत को देखकर कोई मोबाइल नहीं निकाल रहा था…
कोई सेल्फी नहीं ले रहा था…
बस एक सन्नाटा… और बीच-बीच में उठती आवाज़ —
“भारत माता की जय!”
घाट तक पूरा गांव गया।
गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।
अंत्येष्टि हुई।
और मांझी का यह छोटा सा इलाका…
देश के नक्शे पर एक और शहीद का नाम जोड़ गया।
सवाल बस इतना है…

जब तिरंगा लहराना बंद हो जाएगा…
जब भीड़ अपने-अपने घर लौट जाएगी…
तब उस घर की खामोशी कौन सुनेगा?
दो साल का बेटा…
चार साल की बेटी…
बीमार पिता…
और एक पत्नी…
देश सलाम करता है।
गांव गर्व करता है।
लेकिन शहादत…
घर के आंगन में एक लंबी चुप्पी छोड़ जाती है।
जयप्रकाश यादव अमर रहें।


