खबर बिहार की: 22 मजदूरों की जान से खिलवाड़?
यह खबर बिहार की है।
भागलपुर के नवगछिया अनुमंडल के खरीक प्रखंड की खबर। गंगा उफान पर है। कटाव जारी है। और इसी बीच 22 मजदूरों को नाव पर बैठाकर नदी के बीच काम पर भेज दिया जाता है। फिर नाव पलट जाती है। मजदूर जान बचाने के लिए गंगा की तेज धारा से लड़ते हैं। कई बाहर निकल आते हैं, लेकिन दो मजदूर अब भी लापता हैं।
अब सवाल पूछना जरूरी है।
जब गंगा का जलस्तर लगातार बढ़ रहा था, जब कटाव का खतरा पहले से मौजूद था, तब कटाव-रोधी कार्य समय पर क्यों नहीं शुरू किया गया?
बिहार में बाढ़ कोई नई घटना नहीं है। हर साल बाढ़ आती है। हर साल कटाव होता है। हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए जाते हैं। फिर भी जब हालात बिगड़ जाते हैं, तब अचानक अफसरों और ठेकेदारों को काम की याद क्यों आती है?

क्या मजदूर सिर्फ आंकड़े हैं?
क्या उनकी जिंदगी की कीमत सिर्फ एक मुआवजे की घोषणा है?
अगर नदी इतनी खतरनाक थी तो 22 मजदूरों को एक नाव में भेजने की अनुमति किसने दी?
क्या सुरक्षा मानकों का पालन हुआ?
क्या लाइफ जैकेट थीं?
क्या किसी ने यह आकलन किया कि तेज बहाव में काम कराना कितना सुरक्षित है?
बाढ़ प्राकृतिक आपदा हो सकती है, लेकिन बिना तैयारी के मजदूरों को जोखिम में डालना प्राकृतिक नहीं, प्रशासनिक विफलता है।
आज खरीक में दो परिवार अपने लोगों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बिहार को सिर्फ लापता मजदूरों की चिंता नहीं करनी चाहिए। बिहार को यह भी पूछना चाहिए कि ऐसी नौबत आई ही क्यों?
क्योंकि जब व्यवस्था समय पर काम नहीं करती, तब उसकी कीमत सबसे गरीब और सबसे कमजोर लोग चुकाते हैं।
और इस बार वह कीमत गंगा की लहरों के बीच 22 मजदूरों ने चुकाई है।
मैं हूँ संजीव मिश्रा… और यह है “खबर बिहार की”।

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