eBiharDigitalNews

डिजिटल युग का डिजिटल समाचार

बिहार की सड़कें आखिर कब तक खून मांगेंगी? सारण में 3 की मौत, 9 घायल

सारण की यह खबर सिर्फ “ब्रेकिंग न्यूज़” नहीं है।
यह बिहार की सड़कों पर फैली उस चुप्पी की खबर है… जहां मौत अब दुर्घटना नहीं, एक आदत बनती जा रही है।
सुबह के छह बजे हैं।
एनएच-531 पर बनवार फ्लाईओवर के पास एक पिकअप ट्रक से टकराती है।
टक्कर इतनी जोरदार कि पिकअप के परखच्चे उड़ जाते हैं।
कुछ लोग सड़क पर गिरते हैं… कुछ लोहे में दब जाते हैं… और कुछ की सांस वहीं खत्म हो जाती है।
तीन मौतें।

दो युवक — 18 साल के।
एक ही गांव लोहड़ी के।
जितेंद्र कुमार चुन्नू… और संजीत कुमार।
दोनों शायद रात में हंसी-मजाक करते निकले होंगे।
सुबह घर लौटना था… लेकिन घर पहुंची लाश।
एक महिला भी मारी गई।
बताया जा रहा है कि वह बंगाल से आई डांसर थी।
नाम अब भी “अज्ञात” है।
सोचिए… इस देश में कुछ लोग मर जाते हैं और उनका नाम तक खबर में दर्ज नहीं होता।
बाकी नौ लोग घायल हैं।
चार साल की बच्ची भी।
अनुज कुमार और एक अन्य युवक पटना रेफर किए गए हैं।
स्थानीय अस्पताल में चीखें हैं… खून है… और वही सरकारी अफरा-तफरी।
लेकिन सवाल यह है कि

क्या यह सिर्फ एक सड़क हादसा है?
या यह उस व्यवस्था की कहानी है जहां खुले पिकअप पर इंसानों को जानवरों की तरह ढोया जाता है…
जहां रात भर आर्केस्ट्रा में नाच-गाना चलता है…
सुबह वही लोग मौत की गाड़ी में भरकर लौटते हैं…
जहां ड्राइवर थका होता है… सड़क बेपरवाह होती है… और सिस्टम गायब।
सिर्फ तीन दिन पहले भी ऐसी ही घटना हुई थी।
फिर वही मौत।
फिर वही बयान।
फिर वही जांच।
सवाल है —

आखिर कब तक बिहार की सड़कें खून मांगती रहेंगी?
क्या किसी प्रशासनिक अधिकारी ने कभी देखा कि बारातों और आर्केस्ट्रा पार्टियों में लोगों को किस तरह खुले वाहनों में भरकर भेजा जाता है?
क्या किसी ने पूछा कि रात भर कार्यक्रम के बाद ड्राइवर कितनी नींद में गाड़ी चला रहा होता है?
क्या किसी को फर्क पड़ता है कि उन गाड़ियों में बच्चे भी बैठे होते हैं?
हम हर बार कहते हैं — “दुर्घटना दुखद है।”
लेकिन दुखद क्या है?
दुखद यह है कि हम इन मौतों के आदी हो चुके हैं।
रात भर तालियां बजती हैं…
सुबह पोस्टमार्टम होता है।
और फिर अगली बारात निकल पड़ती है।

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *