छपरा के मांझी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डीडीसी लक्ष्मण तिवारी का औचक निरीक्षण हुआ। मशीनें देखी गईं, लैब की जांच हुई, अल्ट्रासाउंड लगाने की बात कही गई। यह प्रशासनिक रूप से एक अच्छी पहल है। लेकिन सवाल यह है — क्या अस्पताल की असली जांच मशीनों से होती है या मरीजों की आंखों में दिखते भरोसे से?

अस्पताल सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं होता। यह वह जगह होती है जहां एक मां अपने बीमार बच्चे को गोद में लेकर उम्मीद के साथ आती है। जहां एक बुजुर्ग अपनी दवा के सहारे जिंदगी की कुछ और सांसें चाहता है। जहां एक गरीब आदमी अपनी पूरी कमाई बचाने के लिए सरकारी इलाज पर भरोसा करता है।

अगर वहां डॉक्टर मौजूद हैं, नर्स मौजूद हैं, दवाएं मौजूद हैं — लेकिन मरीज संतुष्ट नहीं है, तो फिर व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी है। जब मामूली बीमारी में भी मरीज को छपरा रेफर कर दिया जाता है, तो गांव का अस्पताल केवल ‘रेफरल सेंटर’ बनकर रह जाता है।
औचक निरीक्षण जरूरी है। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है “मानवता का निरीक्षण”।

क्या डॉक्टर और नर्स अपनी शपथ को याद रखते हैं?
क्या मरीज से दो मिनट बात कर उसकी परेशानी समझते हैं?
क्या इलाज डर से होता है — या सेवा भावना से?
हर महीने मरीजों से फीडबैक लिया जाना चाहिए। अस्पतालों की रेटिंग होनी चाहिए — ठीक वैसे ही जैसे कॉरपोरेट कंपनियों में प्रदर्शन की समीक्षा होती है। क्योंकि स्वास्थ्य सेवा सिर्फ वेतन और ड्यूटी टाइम तक सीमित नहीं है, यह संवेदनशीलता की परीक्षा भी है।

सरकार अस्पताल बना सकती है, मशीन लगा सकती है, बजट दे सकती है।
लेकिन इलाज तभी सफल होगा, जब सिस्टम के भीतर बैठा हर व्यक्ति यह समझे कि वह सिर्फ नौकरी नहीं, जीवन से जुड़ा दायित्व निभा रहा है।
अस्पताल की असली ताकत अल्ट्रासाउंड मशीन नहीं, मरीज का विश्वास है।
और अगर वह विश्वास टूट गया, तो कोई भी इमारत उसे नहीं बचा सकती।


