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“7 महीने इलाज… ऑपरेशन के बाद मौत!” “सवालों के घेरे में डॉ. नेहा पांडेय का अस्पताल

छपरा में एक बार फिर एक अस्पताल सवालों के घेरे में है।
अस्पताल का नाम है — ऑन हेल्थ हॉस्पिटल।
और डॉक्टर का नाम है — डॉ. नेहा पांडेय।
मृतका का नाम है संगीता कुमारी।
संगीता कुमारी, सारण जिले के पिरारी गांव की रहने वाली थीं। वह मां बनने वाली थीं। परिवार के मुताबिक पिछले करीब सात महीनों से उनका इलाज इसी अस्पताल में चल रहा था। उम्मीद थी कि घर में किलकारी गूंजेगी, लेकिन अब घर में मातम पसरा है।

परिजनों का आरोप है कि प्रसव के लिए ऑपरेशन किया गया। ऑपरेशन के बाद संगीता की हालत बिगड़ती चली गई और आखिरकार उनकी मौत हो गई।
मौत के बाद सिर्फ एक महिला की सांसें नहीं थमीं, बल्कि एक परिवार के सपने भी टूट गए।
इसके बाद जो हुआ, वह बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक जानी-पहचानी तस्वीर है।
गुस्साए परिजन और ग्रामीण सड़क पर उतर आए। दरोगा राय चौक जाम कर दिया गया। लोगों ने अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी की। न्याय और कार्रवाई की मांग उठी।
लेकिन सवाल यह है कि सड़क पर बैठे ये लोग कौन हैं?
ये वही लोग हैं जो अस्पताल में भरोसा लेकर गए थे।
और अब वही लोग सड़क पर जवाब मांग रहे हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि इससे पहले भी डॉ. नेहा पांडेय के अस्पताल को लेकर विवाद और हंगामे की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अगर ऐसा है तो फिर सवाल और बड़ा हो जाता है।
क्या हर मौत के बाद सिर्फ प्रदर्शन होगा?
क्या हर बार प्रशासन पहुंचेगा, समझाएगा, जाम हटवाएगा और मामला खत्म हो जाएगा?
या फिर यह भी पता लगाया जाएगा कि आखिर हुआ क्या था?
प्रशासन मौके पर पहुंचा। लोगों को समझाया गया। जांच और कार्रवाई का भरोसा दिया गया। इसके बाद सड़क जाम समाप्त हुआ।
लेकिन एक परिवार का जाम अभी भी नहीं खुला है।
उनके मन में सवालों का जाम लगा हुआ है।
सवाल कि सात महीने तक इलाज चलने के बाद आखिर ऐसी क्या स्थिति बनी?
सवाल कि ऑपरेशन के बाद हालत क्यों बिगड़ी?
सवाल कि जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों का जवाब न नारों में मिलेगा, न राजनीति में।
जवाब मिलेगा तो सिर्फ निष्पक्ष जांच में।
क्योंकि यह सिर्फ संगीता कुमारी की कहानी नहीं है।
यह उस भरोसे की कहानी है, जिसके सहारे बिहार का आम आदमी अस्पताल का दरवाजा खटखटाता है।
और जब भरोसा टूटता है, तब सड़क जाम होती है।
तब सवाल उठते हैं।
और तब व्यवस्था को जवाब देना पड़ता है।

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