सीआरपीएफ का जवान छुट्टी में घर आया था…
सिर्फ पांच दिन पहले।
घर में खुशियां थीं,
बच्चों की हंसी थी,
परिवार को इंतजार था—कुछ सुकून भरे पलों का।
लेकिन किसे पता था…
ये मुलाकात आख़िरी होगी।
सीआरपीएफ का जवान देश की सुरक्षा में तैनात था…
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में पोस्टेड।
अचानक तबीयत बिगड़ी…
बुखार आया…
और हालत इतनी खराब हुई कि छपरा से पटना अस्पताल ले जाना पड़ा।
इलाज चला…
लेकिन वो जिंदगी की जंग हार गए।
आज रामनवमी है…
पूरा गांव जहां खुशियां मना रहा है,
वहीं नैनी गांव का एक घर गहरे मातम में डूबा है।
जिस बेटे के आने से आंगन गुलजार हुआ था,
आज उसी के जाने से सन्नाटा पसरा है।
मंटू सिंह…
अब तिरंगे में लिपटकर घर लौटे हैं।
पीछे रह गए—
दो मासूम बच्चे,
एक पत्नी,
और एक टूटता हुआ परिवार।
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई,
लेकिन परिवार के आंसू…
थमने का नाम नहीं ले रहे।

गांव के लोग कहते हैं—
वो सिर्फ एक जवान नहीं थे,
एक अच्छा इंसान थे,
सबको जोड़ने वाले।
आज पूरा गांव यही कह रहा है—
देश ने एक बहादुर जवान खो दिया…
और एक परिवार ने अपना सहारा।
और शायद…
आज के इस शोर-शराबे, त्योहार और खुशियों के बीच
ये खामोशी हमें कुछ सोचने पर मजबूर करती है…
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