मंदिर… आस्था… और भीड़…
ये तीन शब्द आज नालंदा की उस घटना के बाद फिर से सवाल बनकर खड़े हैं।
Nalanda के मघड़ा गांव में स्थित मां शीतला मंदिर…
जहां लोग पूजा करने पहुंचे थे… लेकिन लौटे नहीं…
आठ लोगों की मौत…
कई घायल…

कई घायल…
और वो दृश्य… जहां इंसान, इंसान पर गिरता चला गया…
ये कोई पहली घटना नहीं है…
हर साल… किसी न किसी मंदिर… किसी न किसी मेले… किसी न किसी श्रद्धा के केंद्र में…
भीड़… बेकाबू होती है… और फिर खबर बनती है—
“भगदड़ में मौत…”
सवाल है…
क्या आस्था का मतलब भीड़ है?
लोग कहते हैं—
“वहां चमत्कार होता है…”
“वहां मनोकामना पूरी होती है…”
लेकिन क्या भगवान सिर्फ वहीं हैं?
क्या आपके घर के पास वाला मंदिर…
उतना पवित्र नहीं?
तुलसीदास कहते हैं—
भगवान हर जगह हैं…
फिर क्यों…
हम अपनी आस्था को भीड़ में बदल देते हैं?
जहां सांस लेना मुश्किल हो जाए…
जहां एक धक्का…
जिंदगी और मौत के बीच की दूरी तय कर दे…
इस घटना में…
एक थाना प्रभारी सस्पेंड कर दिए गए हैं…
जांच होगी…
रिपोर्ट आएगी…
लेकिन…
क्या सिर्फ जिम्मेदारी तय करने से…
ये घटनाएं रुक जाएंगी?
या फिर हमें…
अपनी आस्था के तरीके पर भी सवाल उठाना होगा?
भगवान…
कभी नहीं चाहते कि
उनके नाम पर…
किसी की जान जाए…
आस्था जरूरी है…
लेकिन…
जिंदगी उससे भी ज्यादा जरूरी है।
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