9,000 में ईमान गिरवी: छपरा में दरोगा जी ‘रंगे हाथ’ पकड़े गए”
जी हाँ… कहानी वही पुरानी, किरदार नया।
जगह – छपरा का डोरीगंज थाना।
और इस बार ‘हीरो’ नहीं, सिस्टम का एक और ‘खलनायक’ पकड़ा गया।
निगरानी विभाग ने दरोगा सी मोहित मोहन को ₹9,000 की रिश्वत लेते हुए धर दबोचा। मामला सीधा था, लेकिन सधा हुआ—
परिवादी के परिजनों के खिलाफ दर्ज एक केस में नाम हटाने के बदले ₹10,000 की डिमांड।
लेकिन इस बार कहानी में ट्विस्ट आया।
परिवादी ने “सेटिंग” नहीं, “सिस्टम” चुना… सीधा शिकायत कर दी निगरानी विभाग में।
फिर क्या था—जाल बिछा, नोट सजे, और दरोगा जी उसी जाल में फँस गए जिसे वो रोज दूसरों के लिए बुनते थे।
सवाल वही पुराना, जवाब अब तक अधूरा…
निगरानी अपना काम कर रही है, पकड़ भी रही है…
लेकिन क्या ये काफी है?
क्योंकि सच्चाई थोड़ी कड़वी है—
भ्रष्टाचार अब सिर्फ एक खबर नहीं, एक आदत बन चुका है।
ऐसा लगता है जैसे सिस्टम एक पेड़ है—
ऊपर से हरा-भरा, लेकिन अंदर से दीमक खा चुकी है।
एक दरोगा पकड़ा गया…
पर सवाल ये है कि कितने अभी भी खुले घूम रहे हैं?
जैसे समुद्र से एक कटोरी पानी निकाल लो—
समुद्र तो वही रहता है।
असली बीमारी कहाँ है?
मुद्दा सिर्फ ₹9,000 नहीं है…
मुद्दा वो सोच है, जो कहती है—
“मौका मिले तो कमा लो…”
जब तक बचपन से ये नहीं सिखाया जाएगा कि
चोरी गलत है, भ्रष्टाचार गुनाह है,
तब तक ये ‘नशा’ चलता रहेगा।
और ये नशा खतरनाक है—
क्योंकि इसमें पैसा दिखता है, लेकिन ईमान मर जाता है।
अंत में…
निगरानी विभाग की कार्रवाई सराहनीय है…
लेकिन जड़ें इतनी गहरी हैं कि सिर्फ कार्रवाई से बात नहीं बनेगी।
सवाल आपसे है—
क्या हम सिर्फ खबर पढ़ेंगे, या सोच भी बदलेंगे?

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