
सारण… एक ऐसा जिला जहां इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि घरों, मंदिरों और पुराने संदूकों में जिंदा है। लेकिन सवाल ये है… क्या ये विरासत सुरक्षित है?
अब इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए आगे आए हैं सारण के जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव।
10 अप्रैल को छपरा से एक बड़ी पहल शुरू हुई—‘ज्ञान भारतम’ मिशन।
एक ऐसा मिशन जिसका मकसद है… सारण में बिखरी पड़ी प्राचीन पांडुलिपियों को ढूंढना, सहेजना और डिजिटल रूप में संरक्षित करना।
ये पांडुलिपियाँ कोई आम कागज नहीं हैं…
ये ताड़ के पत्तों, भोजपत्र, कपड़े और पुराने कागजों पर लिखी वो धरोहर हैं… जिनमें छिपा है आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, धर्म, साहित्य और हमारा इतिहास।
अब प्रशासन इन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक के जरिए डिजिटल बना रहा है… ताकि ये आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंच सके।
इसके लिए प्रशासन ने पूरी रणनीति तैयार की है…
धार्मिक स्थलों से लेकर पुराने पुस्तकालय… राजघरानों से लेकर गांव-गांव तक खोज अभियान चलाया जा रहा है।
सोनपुर का हरिहरनाथ मंदिर हो…
या सारण का आमी मंदिर…
हर जगह छिपे ज्ञान को सामने लाने की कोशिश हो रही है।
इतना ही नहीं…
हथुआ स्टेट और बेतिया राज जैसे ऐतिहासिक घरानों के अभिलेख भी खंगाले जा रहे हैं।
और इस मिशन को सफल बनाने के लिए जयप्रकाश विश्वविद्यालय, लेखक, बुद्धिजीवी और आम नागरिकों को भी जोड़ा जा रहा है।
जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव की अपील साफ है…
अगर आपके पास 75 साल या उससे पुरानी कोई पांडुलिपि है… तो उसे प्रशासन के साथ साझा करें।
और खास बात ये है…
पांडुलिपि आपकी ही रहेगी… प्रशासन सिर्फ उसका डिजिटल रिकॉर्ड बनाएगा।
ग्राउंड पर भी इस मिशन की शुरुआत हो चुकी है…
चिरांद में ज्योतिषाचार्य की हस्तलिखित रचनाओं का निरीक्षण किया गया।
वहीं कुतुबपुर दियारा में… भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर के गांव पहुंचकर उनके दस्तावेजों को देखा गया।
इस दौरान डीडीसी लक्ष्मण तिवारी भी मौजूद थे… और उन्होंने इस पहल को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
अब सवाल आपसे है…
आपके घर में रखी पुरानी किताब… कहीं इतिहास का खजाना तो नहीं?
अगर है… तो वक्त आ गया है उसे बचाने का।
क्योंकि अगर आज नहीं संभाला… तो कल शायद बहुत देर हो जाएगी।
🎯 सारण से छपरा तक… ये सिर्फ खबर नहीं…
ये एक मिशन है—अपनी विरासत को बचाने का

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