
छपरा शहर का अंबेडकर भवन, मलखाना चौक…
भीड़ है। नीले झंडों की कतार है। माल्यार्पण है। मोबाइल कैमरे हैं।
और इनके बीच कहीं—एक सवाल भी खड़ा है, चुपचाप।
14 अप्रैल… हर साल आती है।
लोग आते हैं। फूल चढ़ाते हैं। फोटो खिंचवाते हैं।
और फिर… क्या होता है?
बाबासाहेब ने सिर्फ एक संविधान नहीं लिखा था,
उन्होंने एक सोच लिखी थी—बराबरी की, सवाल करने की, अन्याय के खिलाफ खड़े होने की।
लेकिन क्या वो सोच भीड़ में दिखती है?
या सिर्फ झंडों के रंग में सिमट जाती है?
आज छपरा में जो भीड़ है, वो श्रद्धा की भीड़ है—इसमें कोई शक नहीं।
लेकिन श्रद्धा अगर सवाल न करे,
तो वो सिर्फ एक परंपरा बनकर रह जाती है।
नीला झंडा… पहचान बन गया है।
पर क्या पहचान ही सब कुछ है?
क्या बाबासाहेब को सिर्फ एक रंग में बांधा जा सकता है?
संविधान किसी एक वर्ग के लिए नहीं लिखा गया था।
वो सबके लिए था—हर उस इंसान के लिए
जो बराबरी चाहता है, न्याय चाहता है, सम्मान चाहता है।
फिर ऐसा क्यों है कि
एक वर्ग ज्यादा जुड़ा दिखता है,
और बाकी लोग दूर से देखते हैं?
शायद इसलिए कि
हमने बाबासाहेब को पढ़ा कम,
और मनाया ज्यादा है।
मंच पर भाषण हो रहे हैं…
लोग अपने-अपने तरीके से उन्हें याद कर रहे हैं…
लेकिन असली सवाल मंच के नीचे खड़ा है—
क्या हम उनके बताए रास्ते पर चल भी रहे हैं?
या फिर…
जयंती हर साल आएगी,
भीड़ हर साल जुटेगी,
और बाबासाहेब…
धीरे-धीरे एक तस्वीर में सिमट जाएंगे।
आज का दिन सिर्फ याद करने का नहीं है,
सोचने का भी है।
क्योंकि
फूल चढ़ाना आसान है,
सिद्धांतों पर चलना… थोड़ा मुश्किल।

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