
छपरा का जयप्रकाश विश्वविद्यालय…
तारीख वही… मौका वही… और परंपरा भी वही—
डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती।
मंच सजा है।
तस्वीर पर माल्यार्पण हो चुका है।
शब्दों का सिलसिला शुरू होता है—समता, न्याय, संविधान, जातिविहीन समाज।
कुलपति प्रोफेसर परमेन्द्र कुमार बाजपेई की अध्यक्षता में कार्यक्रम चलता है।
प्रोफेसर अजीत कुमार तिवारी, प्रोफेसर विभुकुमार, प्रोफेसर कमलजी, प्रोफेसर आशा रानी…
नाम जुड़ते जाते हैं, भाषण आगे बढ़ता जाता है।
कहा जाता है—
अंबेडकर को पढ़िए।
समाज को बराबरी की ओर ले जाइए।
संविधान में न्याय, स्वतंत्रता और समता की बात कीजिए।
सब कुछ सही है।
कागज़ पर, मंच पर, और शब्दों में—सब कुछ ठीक है।
लेकिन…
यहीं से खबर शुरू होती है।
क्योंकि सवाल यह नहीं है कि जयंती कैसे मनाई गई।
सवाल यह है कि जयंती के बाद क्या बदला?
क्या विश्वविद्यालय में सेमेस्टर समय पर पूरा होता है?
क्या छात्रों को समय पर परिणाम मिलते हैं?
क्या शिक्षा वही है जो भविष्य बनाती है—या सिर्फ डिग्री देती है?
छात्र कहते हैं—
समस्या भाषण की नहीं है…
समस्या व्यवस्था की है।
अगर एक भी छात्र असंतुष्ट है, तो क्या जयंती का भाषण उस असंतोष को ढक सकता है?
कहा जाता है—
भ्रष्टाचार है।
फंड आता है… लेकिन उसका रास्ता बदल जाता है।
और जो सिस्टम के करीब हैं, वही सिस्टम को कमजोर भी कर रहे हैं।
ये आरोप हैं।
इनकी पुष्टि जांच से होगी।
लेकिन सवाल पूछना… लोकतंत्र का हिस्सा है।
अंबेडकर ने संविधान दिया—
जिसमें अधिकार भी हैं… और सवाल करने की आज़ादी भी।
तो क्या विश्वविद्यालय उस आज़ादी को स्वीकार करता है?
या फिर जयंती के दिन ही उसे याद किया जाता है?
प्रोफेसर विभुकुमार ने कहा—
अंबेडकर के विचारों से संस्थाएं बनीं।
प्रोफेसर कमलजी ने कहा—
जातिविहीन समाज की जरूरत है।
लेकिन…
क्या विश्वविद्यालय खुद एक समान, पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था बन पाया है?
कुलपति कहते हैं—
धर्म के आधार पर विभाजन नहीं होना चाहिए।
सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता होनी चाहिए।
बात फिर वही—
सही है… लेकिन अधूरी है।
क्योंकि अंबेडकर सिर्फ विचार नहीं थे—
वह एक क्रियान्वयन थे।
एक संघर्ष थे।
एक जवाब थे।
और आज…
जरूरत शायद भाषण की नहीं,
बल्कि उसी जवाब को लागू करने की है।
कार्यक्रम समाप्त होता है।
धन्यवाद ज्ञापन होता है।
तस्वीरें खिंचती हैं।
और सवाल…
वहीं रह जाते हैं।

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