
आज “बंद करो” का नारा गूंज रहा था…
लेकिन ये बंद किसी ऑफिस का नहीं था,
न कोई बाजार…
न कोई फैक्ट्री…
ये था एक स्कूल…
जहां बच्चों का भविष्य लिखा जाता है।
बिहार के छपरा में, HR इंपीरियल स्कूल के बाहर
सैकड़ों पेरेंट्स सड़क पर उतर आए।
हाथ में तख्तियां… आंखों में गुस्सा… और जेब में खालीपन।
मामला सीधा है… लेकिन असर गहरा।
पेरेंट्स कह रहे हैं—
“हम अपनी खून-पसीने की कमाई बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं,
लेकिन स्कूल उसे ‘फीस’ के नाम पर निचोड़ रहा है।”
हाल ही में जिलाधिकारी का आदेश आया था—
री-एडमिशन, यूनिफॉर्म, किताबों पर मनमानी वसूली नहीं होगी।
लेकिन आरोप ये है कि आदेश का नाम बदल गया…
और फीस भी।
कहीं “एनुअल फीस”…
कहीं “डेवलपमेंट चार्ज”…
कहीं “एक्टिविटी फीस”…
नाम बदलता गया…
लेकिन बोझ वही रहा।

“तालीम के नाम पर बाजार सज गया,
मासूम बचपन भी अब हिसाब में बंट गया।”
सवाल ये है—
जब सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ढंग से नहीं होगी,
तो पेरेंट्स जाएंगे कहां?
और जब प्राइवेट स्कूल में जाएंगे,
तो क्या अपनी कमर तोड़कर पढ़ाएंगे?
एक तरफ सपने हैं—
“मेरा बच्चा आगे बढ़े…”
दूसरी तरफ हकीकत है—
“घर का खर्च कैसे चले?”
पेरेंट्स का कहना है—
हर चीज का एक रेट तय होना चाहिए।
किताबें एनसीईआरटी पैटर्न की हैं,
लेकिन रंगीन और प्राइवेट छपाई के नाम पर
दाम 10 गुना तक बढ़ जाते हैं।
जिस किताब की कीमत 80 रुपये होनी चाहिए,
वो 800 में मिलती है।
उधर स्कूल का पक्ष भी सुन लीजिए…
स्कूल के प्रिंसिपल अरविंद कुमार कहते हैं—
“हम कोई री-एडमिशन फीस नहीं लेते।
एनुअल फीस लेते हैं, जो नियम के अनुसार है।
अगर हम गलत हैं, तो साबित कीजिए…
हम प्रशासन के हर आदेश का पालन करेंगे।”
यानी…
एक तरफ पेरेंट्स का गुस्सा,
दूसरी तरफ स्कूल का बचाव।
लेकिन असली सवाल अभी भी खड़ा है—
क्या शिक्षा अब सेवा नहीं,
सिर्फ कारोबार बन चुकी है?
“इल्म की रौशनी थी जो घर-घर जानी थी,
अब फीस की दीवारों में वो कैद हो गई।”
अगर हर चीज का कोई पैमाना नहीं होगा,
तो ये लड़ाई यहीं खत्म नहीं होगी।
पेरेंट्स ने चेतावनी दी है—
अगर बात नहीं सुनी गई,
तो अगला कदम और बड़ा होगा।
अब देखना ये है—
प्रशासन सिर्फ आदेश देगा…
या उसे जमीन पर उतारेगा भी?
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