हजारों करोड़ का छपरा का सदर अस्पताल…
और एक सीढ़ी…
जहां जिंदगी ने जन्म लिया — और व्यवस्था नाकाम हो गई।
ये खबर सिर्फ एक घटना नहीं है…
ये उस सिस्टम का एक्स-रे है, जिसे हम “स्वास्थ्य व्यवस्था” कहते हैं।
छपरा का सदर अस्पताल…
बड़ा भवन, ऊंची दीवारें, करोड़ों का बजट…
लेकिन एक लिफ्ट — महीनों से बंद।
और उसी बंद लिफ्ट की कीमत…
एक महिला ने अपनी प्रसव पीड़ा में चुकाई।
बुधवार की शाम…
खुशी कुमारी नाम की एक महिला, प्रसव पीड़ा से कराहती हुई अस्पताल पहुंचती है।
उसे दूसरे तल पर बने मातृ-शिशु वार्ड में जाना था…
लेकिन लिफ्ट बंद है।
सीढ़ियां ही रास्ता हैं।
परिजनों के कंधे…
और दर्द से टूटी हुई एक देह…
धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ती है…
और फिर —
पहली मंजिल की सीढ़ी पर ही…
बच्चे का जन्म हो जाता है।
सोचिए…
जिस जगह ऑपरेशन थिएटर होना चाहिए था…
वहां सीढ़ी है।
जहां डॉक्टर होने चाहिए थे…
वहां घबराए हुए परिजन हैं।
और उस नवजात का स्वागत…
फूलों से नहीं, बल्कि कंक्रीट की सीढ़ियों से होता है।
सिर में चोट की आशंका…
ये शब्द नहीं हैं…
ये उस सिस्टम की संवेदनहीनता का प्रमाण हैं।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
सीढ़ियों पर खून फैला है…
मां दर्द में है…
बच्चा असुरक्षित है…
और सफाईकर्मी क्या करते हैं?
वो परिजनों से कहते हैं —
“आप ही साफ कर दीजिए…”
यही है हमारा “सरकारी सिस्टम”।
जहां
जिम्मेदारी फाइलों में रहती है…
और इंसान सीढ़ियों पर जन्म लेता है।
स्थानीय लोग बताते हैं —
लिफ्ट खराब है, इसकी शिकायत कई बार की गई।
विधायक तक को जानकारी दी गई।
निरीक्षण भी हुआ…
लेकिन सुधार?
वो अब भी “प्रक्रिया में” है।
सवाल बहुत सीधा है —
क्या करोड़ों की इमारत ही अस्पताल है?
या फिर वो व्यवस्था…
जो समय पर एक मां को सुरक्षित प्रसव दे सके?
छपरा का सदर अस्पताल…
आज सिर्फ एक अस्पताल नहीं…
बल्कि एक आईना है।
जिसमें दिखता है —
सरकारी फंड का सच…
और मानवता का हाल।
ये खबर यहीं खत्म नहीं होती…
क्योंकि अगली सीढ़ी पर…
शायद कोई और जिंदगी इंतजार कर रही है।
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