“जिस दिन एक पत्नी की जिद के आगे यमराज भी हार गए थे…
कल फिर उसी प्रेम, विश्वास और सुहाग की रक्षा का दिन है — वट सावित्री व्रत…”
कहते हैं…
जब प्रेम सच्चा हो… विश्वास अटूट हो…
तो किस्मत भी झुक जाती है… और मौत भी हार मान लेती है।
यह सिर्फ एक कहानी नहीं…
यह उस पत्नी की आस्था की कहानी है… जिसने अपने पति को मौत के मुंह से वापस ले आया था।
कथा है सावित्री और सत्यवान की…
जब सत्यवान के प्राण लेने स्वयं यमराज आए…
तब एक पत्नी… अपने पति के पीछे-पीछे चल पड़ी।
न डर… न भय… न हार मानने की जिद…
सावित्री ने अपने तप, अपने प्रेम और अपने पतिव्रता धर्म के बल पर…
यमराज को भी झुका दिया।

और अपने पति सत्यवान को… वापस जीवन दिला दिया।
शायद यही वजह है कि आज भी…
हर सुहागन महिला इस दिन व्रत रखती है।
अपने पति की लंबी उम्र के लिए…
उसके सुख, स्वास्थ्य और सलामती के लिए…
और इस व्रत का सबसे बड़ा साक्षी होता है — वट वृक्ष…
वो बरगद का पेड़…
जिसे सिर्फ एक पेड़ नहीं… बल्कि देवताओं का निवास माना जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि…
इसकी जड़ों में भगवान ब्रह्मा,
तने में भगवान विष्णु,
और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है।
और छपरा में…
इस आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बनता है —
दधीचि आश्रम।
वही पावन भूमि…

जहां त्याग और तपस्या की कहानियां बसती हैं।
जहां मौजूद है एक प्राचीन वट वृक्ष…
जिसके नीचे कल हजारों महिलाएं जुटेंगी।
किसी के हाथ में पूजा की थाली होगी…
किसी की आंखों में पति की सलामती की दुआ…
तो कोई मन ही मन सिर्फ एक ही प्रार्थना कर रही होगी —
“हे भगवान… मेरे सुहाग की रक्षा करना…”
कहा जाता है…
व्रत सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं होता…
यह विश्वास का नाम होता है…
त्याग का नाम होता है…
और उस प्रेम का नाम होता है…
जो हर कठिन समय में अपने रिश्ते के साथ खड़ा रहता है।
कल जब दधीचि आश्रम में हजारों महिलाएं
वट वृक्ष की परिक्रमा करेंगी…
धागा बांधेंगी… पूजा करेंगी…
तब वहां सिर्फ पूजा नहीं होगी…
वहां हजारों पत्नियों की दुआएं आसमान तक जा रही होंगी।
“एक पेड़… तीन देवताओं का वास…
और हजारों महिलाओं की सिर्फ एक प्रार्थना —
मेरे पति की उम्र लंबी हो…”

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