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राष्ट्रीय खेल दिवस पर छपरा में खिलाड़ियों का सम्मान, लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है…

राष्ट्रीय खेल दिवस पर छपरा में खिलाड़ियों का सम्मान, लेकिन सवाल अब भी वही—क्या बिहार का खिलाड़ी सिर्फ सम्मान का हकदार है या सुविधाओं का भी?

राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर रोटरी क्लब छपरा एवं सारण जिला कबड्डी संघ के संयुक्त तत्वावधान में शहर स्थित श्री मोतीलाल आयुर्वेद महाविद्यालय में खिलाड़ियों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन भारतीय कबड्डी महासंघ के कोषाध्यक्ष रमाकांत सिंह सोलंकी,  डॉ. सुरेश प्रसाद सिंह तथा रोटेरियन पुनितेश्वर द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया।
इस अवसर पर कबड्डी, सेपक टकरा, फुटबॉल और योग जैसी विभिन्न खेल विधाओं के उन खिलाड़ियों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर सारण जिले का नाम रोशन किया है। समारोह को संबोधित करते हुए रमाकांत सिंह सोलंकी ने कहा कि सारण के खिलाड़ी आने वाले समय में जिले को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने का कार्य कर रहे हैं। खिलाड़ियों की इसी उपलब्धि को सम्मान देने के उद्देश्य से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया है।
कार्यक्रम में सारण जिला कबड्डी संघ के कोषाध्यक्ष कुमार कौशलेंद्र, सेपक टकरा संघ के सचिव तरुण कुमार, वुशु संघ के प्रतिनिधि वरुण कुमार सहित बड़ी संख्या में खेल प्रेमी उपस्थित रहे।
सम्मानित खिलाड़ियों में प्रमुख रूप से शिवम कुमार, आदित्य कुमार, अमृतसर, विपुल कुमार, आदित्य कुमार सिंह, शुभम कुमार, अंकित कुमार, हर्ष राज, गोविंद कुमार, अनुराग गुप्ता, रितेश सिंह, रितिक सिंह, प्रियांशु राज, उज्जवल कुमार, आर्यन गुप्ता, विवेक कुमार, आदित्य यादव, हिमांशु सिंह, त्रिशिका सिंह, निधि तिवारी, प्रियांशी कुमारी, हिना खातून, हिना परवीन, अंकिता कुमारी, आयुष कुमार, कश्मीर किशोर और बसु राज शामिल रहे।
लेकिन खबर यहीं खत्म नहीं होती।
आज राष्ट्रीय खेल दिवस है। यह दिन हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती पर मनाया जाता है। देश उनके योगदान को याद करता है, खिलाड़ियों को सम्मानित करता है, तस्वीरें खिंचती हैं, तालियां बजती हैं। पर एक सवाल है, और यह सवाल बिहार के हर गांव, हर कस्बे और हर उस बच्चे की ओर से है जो बिना संसाधनों के मैदान में पसीना बहा रहा है।
क्या बिहार का खिलाड़ी सिर्फ सम्मान पाने के लिए पैदा हुआ है?
जिस राज्य के बच्चे बचपन से संघर्ष करना सीखते हैं, जहां जिंदगी की चुनौतियां ही उनकी पहली कोच बन जाती हैं, वहां खेल के लिए बुनियादी सुविधाएं अब भी क्यों नहीं हैं? आज भी कई खेलों के लिए पर्याप्त मैदान नहीं हैं। खिलाड़ियों को आधुनिक प्रशिक्षण नहीं मिलता। खेल किट तक पहुंच सीमित है। प्रतिभाएं हैं, जुनून है, मेहनत है, लेकिन व्यवस्था अक्सर कमजोर नजर आती है।
सरकारें खेलों के लिए बजट और योजनाओं की घोषणा करती हैं। फंड जारी होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह पैसा वास्तव में गांवों और जिलों के उन खिलाड़ियों तक पहुंच पाता है, जो राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का सपना देख रहे हैं?
कबड्डी को ही उदाहरण के तौर पर देख लीजिए। बिहार के खिलाड़ी देशभर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बना रहे हैं। सारण के खिलाड़ी लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन उनकी उपलब्धियों की चर्चा उतनी नहीं होती, जितनी होनी चाहिए।
बिहार के डीएनए में संघर्ष है। यहां का युवा रोजगार के लिए देश के किसी भी कोने तक पहुंच सकता है। फिर वही युवा खेल के मैदान में विश्वस्तरीय पहचान क्यों नहीं बना सकता? कमी प्रतिभा की नहीं है, कमी अवसरों और संसाधनों की है।
राष्ट्रीय खेल दिवस के इस अवसर पर यह सम्मान समारोह खिलाड़ियों के लिए गर्व का विषय है। लेकिन सम्मान के साथ-साथ उन्हें बेहतर मैदान, प्रशिक्षक, खेल सामग्री, पोषण और प्रतियोगिताओं के अवसर भी मिलने चाहिए। तभी मेजर ध्यानचंद का सपना और भारत के खेलों का भविष्य वास्तव में मजबूत होगा।
केंद्र और राज्य सरकार दोनों से अपेक्षा है कि खेलों को शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में रखा जाए। क्योंकि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्र निर्माण का भी आधार है।
सवाल इसलिए जरूरी है, क्योंकि बिहार के गांवों में आज भी हजारों मेजर ध्यानचंद, पी.टी. उषा और नीरज चोपड़ा अपने अवसर का इंतजार कर रहे हैं।

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