सवाल यह है कि जब शहर की सड़कों पर वर्षों तक धूल उड़ती है और फाइलें दफ्तरों में धूल फांकती हैं, तो उसका नुकसान कौन उठाता है? जवाब है—सड़क किनारे बैठा वो छोटा व्यापारी, जो हर सुबह अपनी दुकान का शटर इस उम्मीद में उठाता है कि आज शायद कुछ बेहतर होगा।
बिहार राज्य खाद्यान्न व्यवसायी संघ ने शासन और प्रशासन के सामने अपनी समस्याओं का एक खाका रखा है। यह सिर्फ मांगों की सूची नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर है जहां व्यापारी खुद को असहाय महसूस कर रहा है।
छपरा का वो ढहता भरोसा और लटकता पुल
छपरा में एक डबल डेकर पुल बन रहा है। 10 साल बीत चुके हैं, लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। अब कहा जा रहा है कि 2 साल और लगेंगे। इस अंतहीन इंतजार की कीमत किसने चुकाई? उन दुकानदारों ने जिनकी दुकानें बंद हो गईं, जिनका रोजगार खत्म हो गया। सवाल प्रशासन से है कि 10 साल का वक्त एक निर्माण के लिए कम होता है क्या?
कोरोना की मार और बिजली का बिल

कोरोना काल में जब उद्योग बंद पड़े थे, तब का बिजली बिल आज भी व्यापारियों का पीछा कर रहा है। संघ की मांग है कि इस बकाया बिल को माफ किया जाए ताकि बंद पड़ी इकाइयां फिर से सांस ले सकें। क्या सरकार उन बंद पड़ी चिमनियों को दोबारा धुआं उगलते देखना चाहती है?
ऑनलाइन का दौर और सिमटती दुकानें
एक तरफ ऑनलाइन बाजार का तेजी से बढ़ता जाल है, तो दूसरी तरफ बाजार समिति की वो दुकानें जिनका क्षेत्रफल इतना छोटा है कि सामान रखना भी दूभर है। व्यापारी मांग कर रहे हैं कि उन्हें ऑनलाइन बाजार से मुकाबला करने के लिए I.T. सपोर्ट दिया जाए और दुकानों का क्षेत्रफल बढ़ाया जाए।
संघ ने साफ कहा है कि शासन-प्रशासन की उदासीनता अब दूर होनी चाहिए। सवाल वही है—क्या सत्ता के गलियारों तक इन छोटे व्यापारियों की आवाज पहुंचेगी, या यह मांग पत्र भी किसी सरकारी दराज में बंद होकर रह जाएगा?
नमस्कार।

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