“पटना… राजधानी…
जहाँ कानून की बातें होती हैं…
लेकिन एक बच्ची यहाँ भी सुरक्षित नहीं।”
पटना का बाईपास थाना क्षेत्र…
सती चौरा की एक गली…
और कंबल में लिपटी हुई… 10 साल की रोशनी।
बुधवार की सुबह…
स्कूल ड्रेस में घर से निकली थी…
दूध देने…
लेकिन न स्कूल पहुँची…
न घर लौटी।
परिजन थाने पहुँचे…
गुमशुदगी दर्ज हुई…
और फिर…
24 घंटे बाद…
उसी इलाके की एक गली से उसकी लाश मिलती है।
पुलिस क्या कर रही है?
कहा जा रहा है—
जांच चल रही है…
Forensic Science Laboratory की टीम आई है…
CCTV फुटेज देखे जा रहे हैं…
पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार है…
लेकिन सवाल ये है—
क्या हर बार जवाब “जांच जारी है” ही होगा?
एक बच्ची…
जो चौथी क्लास में पढ़ती थी…
जो रोज स्कूल जाती थी…
उसे कोई रास्ते से उठा लेता है…
और 24 घंटे तक… सिस्टम उसे ढूंढ नहीं पाता।
यह सिर्फ एक हत्या नहीं है…
यह उस भरोसे की हत्या है…
जो लोग अपने शहर… अपने सिस्टम… पर करते हैं।
पटना पूछ रहा है…
और शायद आप भी पूछ रहे होंगे—
क्या हमारे बच्चे सच में सुरक्षित हैं?
या हम सिर्फ सुरक्षित होने का भ्रम जी रहे हैं?
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