
छपरा का सदर अस्पताल।
वही अस्पताल, जहां हर दिन हजारों लोग इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं। कोई दर्द लेकर आता है, कोई बुखार लेकर, कोई अपने किसी प्रियजन की जान बचाने की उम्मीद में।
लेकिन आज थोड़ी सी बारिश हुई और अस्पताल की तस्वीर बदल गई।
गाड़ियां कीचड़ में फंसी हैं। रास्तों पर जाम है। मरीजों और उनके परिजनों को अस्पताल के गेट तक पहुंचने में मशक्कत करनी पड़ रही है। जिस परिसर में इमरजेंसी सेवा है, जहां ओपीडी है, जहां लोगों की जिंदगी का सवाल जुड़ा है, वहां बारिश के बाद की यह हालत कई सवाल खड़े करती है।
कहा जाता है कि विकास हो रहा है। करोड़ों रुपये खर्च हुए हैं। नई इमारतें बनी हैं। योजनाओं की लंबी सूची है। लेकिन अगर थोड़ी सी बारिश के बाद अस्पताल का परिसर ही मरीजों के लिए बाधा बन जाए, तो फिर उन दावों का क्या अर्थ रह जाता है?
सवाल यह नहीं है कि बारिश क्यों हुई।
सवाल यह है कि क्या व्यवस्था इतनी कमजोर है कि कुछ मिनटों की बारिश उसे बेनकाब कर देती है?
क्या एक मरीज को अस्पताल पहुंचने के लिए कीचड़ और जाम से लड़ना चाहिए?
क्या 2026 में भी स्वास्थ्य व्यवस्था की यही तस्वीर स्वीकार कर ली जाए?
छपरा सदर अस्पताल का यह दृश्य सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जो कागजों पर मजबूत दिखती है लेकिन बारिश की कुछ बूंदों के सामने लड़खड़ा जाती है।
सवाल बहुत हैं।
जवाब अभी भी कहीं दिखाई नहीं दे रहे।

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