“मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है…”
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियाँ आज छपरा की सड़कों पर जीवंत दिखाई दे रही थीं।
कदमों में अनुशासन था… आंखों में संकल्प था… और मन में राष्ट्र प्रथम का भाव।
आज वीर शिरोमणि छत्रपति शिवाजी महाराज की स्मृति में निकला यह पथ संचलन केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उस परंपरा का स्मरण था जिसने सिखाया कि राष्ट्र केवल भूखंड नहीं होता, राष्ट्र अपने लोगों की चेतना से बनता है।
छपरा के जन्नत पैलेस से जब गणवेश धारण किए स्वयंसेवकों की कतारें निकलीं, तो ऐसा लगा मानो इतिहास स्वयं वर्तमान के बीच से गुजर रहा हो।
दरोगा राय चौक… रामराज चौक… थाना चौक… म्युनिसिपल चौक…
हर मार्ग पर अनुशासित कदमों की एक ही भाषा थी—सेवा, संगठन और समर्पण।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने कहा था कि स्वराज केवल शासन नहीं, बल्कि समाज के आत्मसम्मान का नाम है। उन्होंने हिंदवी स्वराज्य का वह सपना देखा था जिसमें धर्म, संस्कृति और राष्ट्र गौरव की रक्षा सर्वोच्च कर्तव्य हो।
आज पथ संचलन में शामिल युवाओं को देखकर यही प्रतीत हो रहा था कि शिवाजी केवल इतिहास की पुस्तक में दर्ज एक नाम नहीं हैं, बल्कि एक विचार हैं। ऐसा विचार जो हर पीढ़ी को अपने राष्ट्र, समाज और संस्कृति के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है।
वही मिट्टी… वही धर्म… वही कर्म… और वही जोश…
जो बताता है कि राष्ट्र निर्माण नारों से नहीं, चरित्र से होता है।
आज जब समाज अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब ऐसी तस्वीरें यह विश्वास जगाती हैं कि संगठन की शक्ति और संस्कारों की ऊर्जा अभी भी जीवित है।
छपरा की सड़कों पर आज केवल स्वयंसेवक नहीं चल रहे थे।
चल रहा था अनुशासन। चल रहा था समर्पण। चल रही थी राष्ट्रभक्ति।
और उन कदमों की गूंज मानो यही कह रही थी—
“जय भवानी… जय शिवाजी… जय भारत…”








Leave a Reply