दृश्य सुंदर था।
लेकिन गंगा की कहानी सिर्फ सुंदर दृश्यों से पूरी नहीं होती।
सवाल यह है कि कल-कल करती इस गंगा को साफ, स्वच्छ और निर्मल कौन बनाएगा?
संस्था कार्यक्रम करेगी, तस्वीरें आएंगी, खबरें बनेंगी और फिर शायद अगले साल इसी समय दोबारा मुलाकात होगी।
लेकिन इन सबके बीच गंगा यहीं रहेगी।
उसी किनारे पर।
उसी धारा में।
उसी उम्मीद के साथ।
उम्मीद इस बात की कि कोई उसकी आरती ही नहीं, उसकी चिंता भी करेगा।
क्योंकि गंगा को सबसे ज्यादा खतरा आरती की कमी से नहीं, गंदगी की अधिकता से है।

घाटों पर सफाई कौन करेगा?
नालों का पानी कौन रोकेगा?
प्लास्टिक और कचरे को गंगा में जाने से कौन बचाएगा?
क्या इन सवालों का जवाब भी किसी आरती के मंच से मिलेगा?
या फिर अगले साल एक और भव्य आयोजन होगा और वही सवाल फिर खड़ा रहेगा?
गंगा मां हैं, यह हम सब कहते हैं।
लेकिन मां का सम्मान सिर्फ दीप जलाने से नहीं होता।
मां का सम्मान उसके आंगन को साफ रखने से भी होता है।
इसलिए आरती का स्वागत है।
आस्था का सम्मान है।

लेकिन गंगा के नाम पर सबसे बड़ा दीप उस दिन जलेगा, जिस दिन घाटों पर गंदगी कम होगी, नालों का पानी रुक जाएगा और गंगा की धारा सचमुच निर्मल दिखाई देगी।
तब शायद गंगा भी कहेगी—
मेरी आरती तो बहुत हुई, अब मेरी जिम्मेदारी भी निभाइए।
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