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“गवाह पंकज की हत्या: मासूम बच्चे के सवाल ने सबको रुला दिया”

घर में चीखें हैं। सिसकियां हैं। रोती हुई मां है, बिलखती हुई पत्नी है। और इन सबके बीच एक मासूम बच्चा है, जो बार-बार एक ही सवाल पूछ रहा है—”मेरे पापा जी कहां हैं?”
उसे नहीं पता कि जिन पापा का वह इंतजार कर रहा है, उन्हें अपराधियों ने गोलियों से भून दिया है। उसे नहीं मालूम कि अब उसके पापा कभी घर नहीं लौटेंगे। शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है। हत्या की खबर से भी ज्यादा दर्द उस मासूम सवाल में छिपा है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं है।

आप इस कहानी को जानते हैं। चर्चित दोहरे हत्याकांड के दो चश्मदीद गवाह थे—दो सगे भाई, पंकज और मनीष। पंकज की हत्या कर दी गई है, जबकि उनके भाई मनीष गंभीर रूप से घायल हैं और इलाजरत हैं। घटना को एक दिन बीत चुका है। लेकिन उस घर में समय जैसे थम गया है। घड़ी चल रही है, मगर जिंदगी रुक गई है।
आज पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव इस परिवार से मिलने पहुंचे। घर में दाखिल हुए तो वहां राजनीति नहीं थी, वहां सिर्फ दर्द था। वहां भाषण नहीं था, वहां सिर्फ आंसू थे। वहां आंकड़े नहीं थे, वहां दो छोटे-छोटे बच्चे थे, जो शायद अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर उनके पिता कहां चले गए।
पप्पू यादव ने दोनों बच्चों को गोद में उठाया, उन्हें सांत्वना दी। लेकिन क्या सांत्वना उस खालीपन को भर सकती है, जो एक पिता के चले जाने से पैदा होता है? क्या कोई नेता, कोई अधिकारी, कोई व्यवस्था उन बच्चों को यह समझा सकती है कि उनके पिता का कसूर क्या था?
सवाल सिर्फ पंकज की हत्या का नहीं है। सवाल उन बच्चों के भविष्य का है। सवाल उस पत्नी का है, जिसकी दुनिया एक पल में उजड़ गई। सवाल उस मां का है, जिसकी आंखों के सामने उसका बेटा छीन लिया गया।

और सवाल यह भी है कि आखिर ऐसा कौन-सा अपराध, कौन-सी दुश्मनी, कौन-सी नफरत है, जिसके लिए किसी के सीने में गोलियां उतार दी जाती हैं?
बिहार ने एक दौर ऐसा भी देखा, जब कहा गया कि अपराध पर लगाम लगी है। लेकिन आज फिर सवाल उठ रहे हैं। आखिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं? गवाह सुरक्षित क्यों नहीं हैं? और हर बड़ी घटना के बाद सबसे ज्यादा कीमत आम परिवारों को ही क्यों चुकानी पड़ती है?
क्योंकि खबरों में हत्या सिर्फ एक संख्या होती है। लेकिन उस संख्या के पीछे एक परिवार होता है, एक मां होती है, एक पत्नी होती है, और कुछ मासूम बच्चे होते हैं, जो देर तक दरवाजे की तरफ देखते रहते हैं… इस उम्मीद में कि शायद पापा लौट आएं।
लेकिन इस बार पापा नहीं लौटेंगे।
और यही इस कहानी का सबसे बड़ा दुख है।

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