छपरा की सड़कें और बारिश
बारिश हुई है। बहुत ज्यादा नहीं, बस इतनी कि छपरा की सड़कों की सच्चाई सामने आ जाए। बाजार की सड़कें पानी में डूब गई हैं। लोगों की आवाजाही मुश्किल हो गई है। और यह सिर्फ किसी गली-मोहल्ले की बात नहीं है।
जिलाधिकारी आवास के सामने की सड़क का हाल भी अलग नहीं है। वहां सड़क पर जमा पानी सीधे आवास परिसर की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि जब शहर के सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में जलनिकासी की ऐसी स्थिति है, तो आम मोहल्लों का हाल क्या होगा?
छपरा में सड़कें बन रही हैं, बजट भी खर्च हो रहा है, लेकिन शहर को एक इकाई मानकर योजना बनती हुई नहीं दिखती। एक सड़क ऊंची हो जाती है, दूसरी नीचे रह जाती है। नालों की सफाई और जलनिकासी का नेटवर्क उतनी गति से विकसित नहीं होता, जितनी तेजी से निर्माण कार्य होते हैं। नतीजा यह है कि थोड़ी सी बारिश भी व्यवस्था की परीक्षा बन जाती है।

बारिश ने कोई नई समस्या पैदा नहीं की है। उसने सिर्फ उस समस्या को उजागर किया है, जो वर्षों से मौजूद है। सवाल पानी का नहीं, प्लानिंग का है। सवाल बादलों का नहीं, शहर के भविष्य का है।
छपरा की सड़कों पर भरा पानी एक संदेश दे रहा है—शहर को टुकड़ों में नहीं, समग्र योजना के साथ विकसित करने की जरूरत है। वरना हर मानसून में यही तस्वीरें लौटेंगी और हर बार जिम्मेदारी बारिश पर डाल दी जाएगी।

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