“जरा इन आंखों को देखिए…
ये आंखें अब बूढ़ी हो चुकी हैं। चेहरे पर झुर्रियां हैं, कदम धीमे पड़ गए हैं… लेकिन इन आंखों में आज भी वही चमक है, जो कभी देश की सीमाओं पर दुश्मनों की गोलियों का सामना करते समय हुआ करती थी।
ये वही लोग हैं, जिन्होंने अपनी जवानी देश के नाम कर दी। बर्फ से ढके हिमालय की चोटियों पर डटे रहे… तपते रेगिस्तान में सीना तानकर खड़े रहे… गोलियां खाईं, जख्म सहे, लेकिन तिरंगे को कभी झुकने नहीं दिया।
आज उनकी उम्र 70, 80 या 90 वर्ष हो गई है… लेकिन उनके दिल में देशभक्ति का जज्बा आज भी उतना ही मजबूत है।
और उन वीरांगनाओं को भी आज नमन… जिनके पति भारत माता की रक्षा करते हुए इस मिट्टी में अमर हो गए। जिनकी मांग का सिंदूर देश के नाम हो गया… जिनकी आंखों के आंसू आज भी शहादत की कहानी कहते हैं। उनका बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।
इसी भावना को सम्मान देने के लिए छपरा में ‘शौर्य संबंध’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सारण के जिलाधिकारी, एसएसपी, जयप्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति सहित कई गणमान्य लोगों ने पूर्व सैनिकों, वीर नारियों, वीर माताओं और वयोवृद्ध पेंशनरों को सम्मानित किया।
सम्मान के प्रतीक के रूप में ₹21,000 की सम्मान राशि भी प्रदान की गई। लेकिन सच कहें तो… इन वीरों के त्याग की कीमत किसी राशि से नहीं आंकी जा सकती।

कार्यक्रम में यह संदेश भी दिया गया कि यदि पूर्व सैनिकों, वीरांगनाओं या उनके परिवारों को जमीन, पेंशन, सरकारी योजनाओं या किसी अन्य समस्या का सामना करना पड़े, तो जिला प्रशासन और सैनिक कल्याण विभाग हर कदम पर उनके साथ खड़ा है।
आज छपरा की धरती मानो गर्व से कह रही थी…
“यह देश हमारा है… यह मिट्टी हमारी है… और इसकी रक्षा करने वालों का सम्मान करना हमारा पहला कर्तव्य है।”
कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ये पंक्तियां ऐसे वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि देती हैं—
“कलम, आज उनकी जय बोल,
जो चढ़ गए पुण्य वेदी पर,
लिए बिना गर्दन का मोल।”
और अंत में…
“जो अपने लिए जीते हैं, उन्हें दुनिया याद नहीं रखती…
जो देश के लिए जीते और देश के लिए मर मिटते हैं, इतिहास उनकी अमर गाथा लिखता है।”
जय हिंद। वंदे मातरम् ।

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