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लोक अदालत में बड़ा निपटारा! 987 मामलों का हुआ निष्पादन

छपरा डेस्क

कभी-कभी अदालत का रास्ता लंबा होता है…
इतना लंबा कि मुकदमे के साथ-साथ लोगों की उम्मीद भी तारीखों में उलझ जाती है।
लेकिन लोक अदालत की कहानी थोड़ी अलग है।
यहां कोशिश होती है कि विवाद जीत-हार में नहीं, बल्कि समझौते में खत्म हो… और दोनों पक्ष अपने घर लौट सकें।
छपरा व्यवहार न्यायालय परिसर में 12 सितंबर 2026 को वर्ष 2026 की तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण और बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के निर्देश पर आयोजित इस लोक अदालत में न्यायिक पदाधिकारियों, अधिवक्ताओं, बैंक अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों और बड़ी संख्या में वादकारियों की मौजूदगी रही।
प्रभारी जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकार श्रीमती सच्ची मिश्रा, वरीय पुलिस अधीक्षक रौशन कुमार और अन्य अधिकारियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया।
मामलों के त्वरित निपटारे के लिए कुल 17 पीठों का गठन किया गया था। इनमें दो पीठ DTO कार्यालय और दो पीठ सोनपुर अनुमंडल न्यायालय में गठित की गई थीं।

यहां चेक बाउंस, बैंक ऋण, मोटर दुर्घटना दावा, पारिवारिक विवाद, श्रम विवाद, भूमि अधिग्रहण, राजस्व मामले, बिजली-पानी के बिल और ट्रैफिक चालान जैसे मामलों को सुलह और समझौते के जरिए निपटाने की कोशिश की गई।
और फिर सामने आए आंकड़े…
बैंक से जुड़े मामलों में सेटलमेंट राशि 4 करोड़ 40 लाख 91 हजार 674 रुपये रही, जबकि रिकवरी राशि 2 करोड़ 33 लाख 50 हजार 396 रुपये बताई गई।
न्यायालय स्तर पर 987 मामलों का निष्पादन किया गया।
सोनपुर में रेलवे एक्ट के तहत प्री-लिटिगेशन के 853 मामलों का निष्पादन हुआ।
वहीं DTO कार्यालय और ट्रैफिक से जुड़े मामलों में 666 चालानों का निष्पादन किया गया और कुल 21 लाख 81 हजार 872 रुपये की रिकवरी हुई।
हालांकि, कुछ बेंचों और DTO की रिपोर्ट उस समय तक आना बाकी थी, इसलिए अंतिम आंकड़ा इससे आगे बढ़ सकता है।
प्रभारी जिला जज ने कहा कि लोक अदालत का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक त्वरित, सुलभ और सस्ता न्याय पहुंचाना है। यहां किसी की जीत या हार नहीं होती… बल्कि कोशिश होती है कि दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद समाप्त कर सकें।
और शायद लोक अदालत की सबसे बड़ी खूबसूरती भी यही है…
एक तरफ अदालत के आंकड़ों में हजारों मामले होते हैं, करोड़ों रुपये का सेटलमेंट होता है…
लेकिन उन आंकड़ों के पीछे ऐसे परिवार और लोग होते हैं, जो वर्षों से किसी समाधान का इंतजार कर रहे होते हैं।
जब कोई विवाद समझौते के साथ खत्म होता है, तो सिर्फ एक फाइल बंद नहीं होती…
किसी के जीवन में एक तनाव भी कम होता है।
छपरा की इस राष्ट्रीय लोक अदालत ने इसी कोशिश को आगे बढ़ाया—
मुकदमा कम हो, समाधान बढ़े… और न्याय आम आदमी तक पहुंचे।

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