छपरा से टेरी तक: प्रेमाद्वैत के उस संत की कहानी, जिसने दुनिया को प्रेम का मार्ग दिया
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आज हम आपके लिए कोई सामान्य कहानी नहीं लेकर आए हैं। यह मनोरंजन या कल्पना की कहानी नहीं है। यह भक्ति, श्रद्धा, साधना और शांत मन से सुनने-समझने की एक ऐसी गाथा है, जो हमें आत्मचिंतन, प्रेम और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। इसलिए इस कथा को केवल सुनिए नहीं, बल्कि इसके भाव को समझने का प्रयास कीजिए।
यह कहानी है उस संत की, जिनके विचारों की गूंज आज भी देश-विदेश में सुनाई देती है। यह कहानी है परमहंस दयाल स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज की, जिन्होंने मानवता को प्रेम, ज्ञान और आध्यात्मिक एकता का संदेश दिया।
बिहार के सारण जिले की पावन धरती छपरा को उनकी जन्मस्थली, पालन-पोषण स्थली और ज्ञानस्थली होने का गौरव प्राप्त है। कहा जाता है कि बाल्यकाल से ही उनका मन सांसारिक आकर्षणों से दूर और आध्यात्मिक चिंतन में रमा रहता था। केदार घाट के संतों के सानिध्य में उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। कम आयु में ही साधना और समाधि उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई।
मान्यता है कि मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्हें आत्मज्ञान की अनुभूति हो गई थी। उनके पिता तुलसीराम पाठक जी स्वयं आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने संन्यास का मार्ग अपनाने का निश्चय किया और युवावस्था में ही संसारिक मोह-माया से दूर निकल पड़े।
जब उन्होंने छपरा छोड़ने का निर्णय लिया, तब उनके अंतर्मन से निकले भाव कुछ इस प्रकार बताए जाते हैं—
“बेड़ियों से ऐ जुनूँ रिश्ता मेरा जाता रहा,
जब से जुल्फ़ों में फँसा यह सिलसिला जाता रहा।
किसका ग़म छाया है दिल पर, मुझे किसकी तलाश है,
किसकी आँखें ढूँढ़ती हैं, क्या जाता रहा…”
इसके बाद उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या की। बताया जाता है कि रोहतास की योगिया गुफा में लगभग छह वर्षों तक साधना की और फिर गंगा तथा सरयू के तटों पर वर्षों तक भ्रमण करते हुए आध्यात्मिक अनुभव अर्जित किए।
लगभग 33 वर्ष की आयु में वे मथुरा पहुंचे। वहाँ तीन वर्षों तक रहकर उन्होंने भारतीय दर्शन के विभिन्न पक्षों का गहन अध्ययन किया। यहीं से उनके चिंतन को एक नई दिशा मिली।
भारतीय दर्शन में जहाँ एक ओर द्वैतवाद था और दूसरी ओर अद्वैतवाद, वहीं परमहंस दयाल जी ने दोनों का समन्वय कर मानवता को “प्रेमाद्वैत दर्शन” का अमूल्य उपहार दिया।
उन्होंने बताया कि ज्ञान और प्रेम एक-दूसरे के पूरक हैं। ज्ञान बिना प्रेम अधूरा है और प्रेम बिना ज्ञान दिशाहीन। यही विचार आगे चलकर लाखों लोगों के जीवन का आधार बना।
उनकी लिखी रचनाएँ बहुत कम हैं, लेकिन उनके दो पद आज भी उनके दर्शन का सार माने जाते हैं—
“करहुँ मैं भक्ति-सिंगार नाथ महारानी हूँ जी…”
और
“हमको द्वैत दृष्टि नहीं आती…”
इन पदों में भक्ति, ज्ञान और अद्वैत का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
अपनी यात्राओं के दौरान वे जयपुर पहुंचे और संत आनंदपुरी जी महाराज के सानिध्य में लगभग बारह वर्षों तक रहे। उस समय जयपुर के राजा सवाई माधव सिंह भी आनंदपुरी जी के शिष्य थे। राजा ने उनके लिए आश्रम बनवाने की इच्छा जताई, लेकिन फक्कड़ और विरक्त स्वभाव के स्वामी जी ने इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार नहीं किया।
कहा जाता है कि जयपुर में उनके प्रमुख शिष्यों में भगवानदास नामक एक भक्त थे, जो टेरी के निवासी थे। उनके आग्रह पर स्वामी जी टेरी पहुंचे, जो आज पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित है।
यहीं उन्होंने अपना पहला प्रमुख आश्रम स्थापित किया, जिसका नाम रखा— “कृष्णद्वारा”।
टेरी में उनके सानिध्य में अनेक लोगों का जीवन बदल गया। इन्हीं में बलीराम नामक एक युवक भी थे, जिन्होंने आगे चलकर संन्यास ग्रहण किया और स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। बाद में वही उनके प्रथम उत्तराधिकारी बने।
उनकी शिष्य परंपरा में महात्मा योगानंद जैसी महान साधिका भी थीं, जिन्होंने जयपुर में आध्यात्मिक केंद्र स्थापित किया। वहीं कृष्णानंद जी ने मथुरा में उनके विचारों का प्रचार-प्रसार किया।
स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज का जीवन अत्यंत सादा था। वे भिक्षा में केवल रोटी स्वीकार करते थे। सब्जी या अन्य स्वादिष्ट पदार्थों की उन्हें कोई इच्छा नहीं थी। उनका एकमात्र लक्ष्य था— परमात्मा की प्राप्ति और मानवता का कल्याण।
वे कहा करते थे कि मनुष्य का संपूर्ण जीवन तीन मूल इच्छाओं के इर्द-गिर्द घूमता है—
सत् — अमर रहने की इच्छा।
चित् — पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा।
आनंद — परम सुख की इच्छा।
हर मनुष्य, चाहे वह जाने या अनजाने, इन्हीं तीनों की तलाश में जीवन व्यतीत करता है।
उनके प्रवचनों में रामचरितमानस के प्रसंगों का विशेष स्थान था। वे अक्सर भगवान राम और रावण के संवाद का उदाहरण देते हुए कहते थे कि संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं।
पहले गुलाब की तरह, जो केवल खिलते हैं, लेकिन फल नहीं देते।
दूसरे आम की तरह, जो फूलते भी हैं और फल भी देते हैं।
और तीसरे कटहल की तरह, जो कुछ कहते नहीं, लेकिन करके दिखा देते हैं।
स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज स्वयं इसी तीसरी श्रेणी के महापुरुष थे। उन्होंने अपने जीवन से वह सब सिद्ध कर दिखाया, जिसे दूसरे केवल शब्दों में कहते थे।
टेरी में लगभग 17 वर्षों तक रहकर उन्होंने प्रेम, ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का दीप जलाया और अंततः वहीं समाधि ली। आज भी उनकी समाधि दुनिया भर के अनुयायियों के लिए श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनी हुई है।
समय बदला, सीमाएँ बदलीं, देश विभाजित हुए, लेकिन प्रेमाद्वैत का संदेश कभी सीमाओं में नहीं बंधा। आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में उनके अनुयायी मौजूद हैं।
छपरा की धरती इस बात पर गर्व कर सकती है कि उसने ऐसे संत को जन्म दिया, जिसने ज्ञान को प्रेम का रूप दिया और प्रेम को दर्शन का स्वरूप प्रदान किया।
यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा है। एक ऐसा मार्ग है जो हमें प्रेम, विनम्रता, सेवा और आत्मबोध की ओर ले जाता है।
गुरु कृपा से हम आगे भी स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज, उनकी शिष्य परंपरा और वर्तमान गुरु महाराज के प्रेरक विचार आप तक पहुंचाते रहेंगे।
आप जुड़े रहिए eBihar DigitalNews के साथ। जय गुरु महाराज। 🙏🏻










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