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छपरा में आध्यात्मिक महाकुंभ

परमहंस दयाल स्मृति समारोह 2026
छपरा में आध्यात्मिक महाकुंभ
📍 8 और 9 जुलाई, 2026
आना न भूलें, जानें अपनी गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत।

“छपरा, क्या तुम अपने ही महापुरुष को जानते हो?”
छपरा…
एक ऐसा शहर, जिसकी पहचान अक्सर राजनीति, चुनाव और नेताओं से जोड़कर देखी जाती है।
लेकिन इसी धरती ने एक ऐसे संत को जन्म दिया, जिनके अनुयायी सिर्फ बिहार या भारत में नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में फैले हुए हैं।
हम बात कर रहे हैं परमहंस दयाल जी महाराज की।
वही परमहंस दयाल, जिन्होंने एक मत, एक विचार और एक आध्यात्मिक आंदोलन की नींव रखी।

आज पाकिस्तान से लेकर नेपाल, इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका तक हजारों-लाखों लोग उनके बताए मार्ग पर चलते हैं।
लेकिन सवाल यह है…
क्या छपरा के लोग अपने ही इस महापुरुष को उतना जानते हैं, जितना दुनिया जानती है?
जिस संत के विचारों पर देश-दुनिया में चर्चा होती है… जिसके अनुयायी सीमाओं के पार तक मौजूद हैं… जिसकी जन्मभूमि आज भी छपरा के दहियावां में है…
उस संत के बारे में क्या हम जानते हैं?
यही कारण है कि 8 जुलाई को राजेंद्र स्टेडियम, छपरा में परमहंस दयाल समाधि स्मृति समारोह का आयोजन हो रहा है।

और 9 जुलाई को निकलेगी एक विशाल पदयात्रा…
नंदपुर आश्रम से शुरू होकर दहियावां स्थित जन्मभूमि मंदिर तक।
यह सिर्फ पदयात्रा नहीं है…
यह अपनी जड़ों को पहचानने की यात्रा है।
यह उस संत को याद करने की यात्रा है, जिसने लोगों को जाति, पंथ और सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता का संदेश दिया।
कार्यक्रम में देशभर से संत आएंगे…
विद्वान आएंगे…
समाज के प्रतिष्ठित लोग आएंगे…
और वे बताएंगे कि आखिर परमहंस दयाल जी महाराज का दर्शन क्या था?
उनका संदेश क्या था?
और आज के समय में वह क्यों प्रासंगिक है?
आज जब समाज विभाजन, तनाव और स्वार्थ की राजनीति से जूझ रहा है…
तब ऐसे संतों के विचारों को जानना और समझना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो जाता है।
क्योंकि महापुरुष केवल किसी एक मत या संस्था की संपत्ति नहीं होते…
वे समाज की धरोहर होते हैं।
छपरा की धरती धन्य है…
क्योंकि यहां परमहंस दयाल जी महाराज ने जन्म लिया।
और यह केवल श्रद्धा का विषय नहीं…
बल्कि गर्व का विषय भी है।
इसलिए अगर आप छपरा में हैं…
तो इस कार्यक्रम में जरूर जाइए।
सिर्फ श्रद्धा के लिए नहीं…
जानने के लिए।
समझने के लिए।
और यह जानने के लिए कि आखिर वह कौन व्यक्ति था…
जिसे दुनिया याद करती है…
लेकिन शायद हम अभी भी पूरी तरह नहीं जान पाए हैं।
क्योंकि इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं मिलता… कभी-कभी वह हमारे अपने शहर की मिट्टी में भी छिपा होता है।

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