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छपरा मेडिकल कॉलेज: कर्मचारियों का भविष्य फाइलों में गुम

“मजबूरी, गरीबी, लाचारी, बेरोज़गारी…”
ये सिर्फ़ शब्द नहीं हैं। ये उस आदमी की ज़िंदगी हैं, जो हर सुबह इस उम्मीद में घर से निकलता है कि शाम को बच्चों के लिए रोटी लेकर लौटेगा।
आज कहानी छपरा मेडिकल कॉलेज की है।
करीब 850 करोड़ रुपये की लागत से बना सरकारी अस्पताल। इमारत नई है, दीवारें चमक रही हैं, लेकिन उन दीवारों के भीतर काम करने वालों का भविष्य अंधेरे में धकेला जा रहा है।
यहाँ सफाईकर्मी, सुरक्षा गार्ड, माली, क्लर्क—सभी की भर्ती थर्ड पार्टी एजेंसी के ज़रिए हुई।

आरोप है कि किसी ने 20 हजार, किसी ने 50 हजार, और क्लर्क की नौकरी के लिए किसी ने सवा लाख रुपये तक दिए। क्यों? क्योंकि उन्हें लगा कि सरकारी अस्पताल में काम मिलेगा तो ज़िंदगी संभल जाएगी।
लेकिन अब ठेका बदल गया है।
नई एजेंसी आएगी… पुरानी जाएगी… और उसके साथ चले जाएँगे वे लोग भी, जिन्होंने दो-तीन साल तक इस अस्पताल को अपनी मेहनत से चलाया।
कागज़ पर सिर्फ़ एजेंसी बदली है, लेकिन हकीकत में हजारों परिवारों की रोटी छिन रही है।
एक शेर याद आता है—
“गरीब की किस्मत भी कैसी किताब होती है,
हर नया पन्ना पुराने ज़ख्मों का हिसाब होता है।”
अस्पताल के अधीक्षक कहते हैं—”यह थर्ड पार्टी का मामला है, हम क्या कर सकते हैं?”

यही तो सबसे बड़ा सवाल है।
जब काम लेना होता है, तब कर्मचारी अस्पताल का हिस्सा होता है।
लेकिन जब उसकी नौकरी बचाने की बात आती है, तो कहा जाता है—”हमारी ज़िम्मेदारी नहीं।”
तो फिर ज़िम्मेदारी किसकी है?
सरकार की?
एजेंसी की?
या उस गरीब की, जिसने नौकरी पाने के लिए कर्ज़ लिया, गहने बेचे, ज़मीन गिरवी रखी?
आज “विकसित भारत” का सपना दिखाया जा रहा है।
लेकिन ज़रा उस आदमी से पूछिए, जो 10 हजार रुपये की नौकरी पाने के लिए 1 लाख रुपये घूस देता है।
क्या यही विकास है?
क्या विकास का मतलब सिर्फ़ नई इमारतें हैं?
या उन लोगों का भविष्य भी, जो उन इमारतों को चलाते हैं?
एक और पंक्ति सुनिए—

“महलों की चमक देखकर मत कहना देश बदल गया,
ज़रा उन झोपड़ियों में भी जाना जहाँ चूल्हा आज भी इंतज़ार में जलता है।”
सबसे बड़ा दर्द नौकरी जाने का नहीं होता।
सबसे बड़ा दर्द तब होता है, जब आपको यह एहसास दिला दिया जाए कि “तुम सिर्फ़ ठेके का हिस्सा थे, इंसान नहीं।”
हज़ारों कर्मचारी आज सड़क पर हैं।
उनके हाथ में डिग्री नहीं, आंदोलन का बैनर है।
आँखों में आँसू हैं।
और होठों पर सिर्फ़ एक सवाल—
“हमने मेहनत की सज़ा क्यों पाई?”
यह सिर्फ़ छपरा मेडिकल कॉलेज की कहानी नहीं है।
यह उस व्यवस्था की कहानी है, जहाँ आदमी की कीमत उसके काम से नहीं, उसके ठेके से तय होती है।
और जब व्यवस्था इंसान से ज़्यादा ठेके को बचाने लगे…
तो समझ लीजिए, अस्पताल सिर्फ़ बीमारों का इलाज नहीं कर रहा, बल्कि व्यवस्था खुद भी गंभीर रूप से बीमार है

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