बात सिर्फ एक पर्चे की नहीं है, बात उस समाज की है जो दूसरों को पढ़ाता है, लेकिन खुद अपने हक के लिए किसी के आगे हाथ फैलाए खड़ा रहता है। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राहुल राज ने पर्चा भर दिया है। समर्थकों का दावा है कि राहुल राज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, भाजपा के एक कद्दावर नेता माने जाते हैं, पिछले साढ़े तीन-चार सालों से जमीन पर पसीना बहा रहे थे।
लेकिन राजनीति की बिसात पर मोहरे कैसे बदले जाते हैं, इसे समझिए। खबर यह भी है कि पार्टी का दस्तखत, यानी आधिकारिक टिकट, उन्हें नहीं मिला। फिर भी राहुल राज मैदान में डटे हैं। अब सवाल यह है—क्या पार्टी का ठप्पा न होना किसी नेता की ताकत घटाता है या शिक्षकों के बीच उसकी साख ही उसकी असली ‘टिकट’ बनती है? राहुल राज कहते हैं, “हम वादों या खोखले प्रतिनिधित्व के साथी नहीं, शिक्षकों के संघर्ष के साथी बनेंगे।”

सुनने में यह बयान काफी वजनदार लगता है, लेकिन क्या चुनाव के इस मौसम में यह सिर्फ एक और भावनात्मक जुमला है, या वाकई किसी के पास शिक्षकों की उन बुनियादी समस्याओं का जवाब है जिनका हल बरसों से नहीं निकला?
सारण का यह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र कोई छोटा-मोटा इलाका नहीं है। इसमें सारण, सीवान, गोपालगंज, पूर्वी चंपारण और पश्चिम चंपारण जैसे पांच बड़े जिले आते हैं। करीब 10,000 से ज्यादा मतदाता हैं। और ये मतदाता कोई आम जनता नहीं हैं, ये ‘मास्टर साहब’ हैं—जो देश का भविष्य गढ़ते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि देश का भविष्य बनाने वाले इन शिक्षकों को हर चुनाव बाद अपने ही प्रतिनिधि के आगे गुहार लगानी पड़ती है।
सारण के इस मैदान में प्रत्याशी तो कई उतरे हैं और वोटिंग की उलटी गिनती भी शुरू हो चुकी है। अब देखना यह है कि क्या सारण के शिक्षक पार्टी के सिंबल पर रीझते हैं, या उस साथी को चुनते हैं जो उनके संघर्ष में साथ खड़ा होने का दावा कर रहा है।
पर सवाल वही रह जाता है—क्या इस बार चुनाव से शिक्षक का जीवन बदलेगा, या सिर्फ प्रतिनिधि का चेहरा?
नमस्कार।
मेरा नाम संजीव मिश्रा
न्यूज एनालिस्ट
ebihardigitalnews.com









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