“देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान… कितना बदल गया इंसान”
यह सिर्फ एक गाना नहीं है, यह समय का आईना है।
छपरा की यह कहानी आपको भीतर तक बेचैन कर देगी।
सारण जिले के जलालपुर के पास की रहने वाली मंजू देवी—एक मां, जिसने अपने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, भूख सहकर उन्हें खिलाया, अपनी खुशियों को गिरवी रखकर उनका भविष्य बनाया…
आज वही मां अपने बुढ़ापे में बेसहारा है।
करीब तीन साल से वह मथुरा के एक आश्रम में रह रही हैं।
लेकिन यह सफर इतना सीधा नहीं था।
करीब डेढ़ साल तक उन्होंने सड़कों पर भटकते हुए बिताया।
ना छत, ना सहारा…

वह शहर, जहां बड़े-बड़े प्रवचन होते हैं, जहां मंचों से कहा जाता है—“हर मां को आश्रय मिलेगा”…
वहीं मंजू देवी को कोई ठिकाना नहीं मिला।
आख़िरकार, पागल बाबा आश्रम के एक मैनेजर ने उन्हें शरण दी।
पिछले डेढ़ साल से वही उनकी दुनिया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है—
तीन-तीन बच्चों की मां, आज अकेली क्यों है?
मंजू देवी कहती हैं—
“अब मैं किस मुंह से घर जाऊं?
मैं रास्ते में मर जाऊंगी… मथुरा में ही मर जाऊंगी…
कोई उठाकर फेंक देगा, पर मैं घर नहीं जाऊंगी।”
ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, ये टूटे हुए रिश्तों की आवाज़ है।
हमारे संपादक संजीव मिश्रा जब उनसे मिले, तो उन्होंने कपड़े और जरूरी सामान देकर मदद की।

लेकिन उस दिन एक और चीज़ सामने आई—
एक सवाल, जो हम सबके लिए है।
हम अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी लगा देते हैं…
लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखा पाते हैं कि बुढ़ापा बोझ नहीं होता?
आज मंजू देवी हैं…
कल कोई और होगा…
और शायद एक दिन—हम खुद।
बुढ़ापा अभिशाप नहीं है…
लेकिन हमारा व्यवहार उसे अभिशाप बना देता है।
यह कहानी खत्म नहीं होती…
यह हर उस घर में चल रही है, जहां बुजुर्ग चुप हैं—और बच्चे व्यस्त।
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