ये जो आप देख रहे हैं… ये कोई फिल्म का सीन नहीं है! ये छपरा का सरकारी बाजार है… जहां बुलडोजर गरज रहा है, पुलिस घूम रही है, नगर निगम फाइन काट रहा है… और सड़क से अतिक्रमण हटाया जा रहा है!”
सवाल ये है कि क्या सच में अतिक्रमण हट रहा है… या बस आज का शो चल रहा है?

सैकड़ों साल पुरानी ये सड़क… सरकारी बाजार से मोना चौक तक जाने वाली ये लाइफलाइन… जहां रोज़ ठेले, फल वाले, सब्जी वाले, जमीन पर दुकान लगाने वाले… सड़क को बाजार बना देते हैं। नतीजा? दिन भर जाम… पैदल चलना मुश्किल… बाइक फंसी, एम्बुलेंस फंसी, आम आदमी परेशान!
आज बुलडोजर आया… ठेले हटे… सड़क साफ दिखने लगी।
लेकिन कहानी में ट्विस्ट देखिए…

“इधर बुलडोजर गया… उधर फिर ठेला लगना शुरू!”
क्योंकि ये दुकानें पक्की नहीं हैं… टेंपरेरी हैं। सुबह हटे, शाम को फिर आ गए।
तो सवाल उठता है—
नगर निगम चाहता क्या है?
अगर सच में अतिक्रमण मुक्त करना है… तो परमानेंट प्लान चाहिए।
फुटपाथी दुकानदारों को दूसरी जगह चाहिए।
एक व्यवस्थित सब्जी मंडी चाहिए… जहां वो भी कमाएं और सड़क भी बचे।
और अगर मकसद सिर्फ फाइन काटना और फोटो खिंचवाना है… तो फिर ये अभियान हर हफ्ते चलेगा… बुलडोजर आएगा, जाएगा… और जाम वहीं का वहीं रहेगा।
क्योंकि सच ये है कि सरकारी बाजार की सड़क अगर खाली हो जाए… तो साहेबगंज तक लगने वाला जाम आधा खत्म हो सकता है।
60-80 फीट की सड़क लोगों को राहत दे सकती है।
लेकिन आखिरी सवाल वही—
“छपरा में बुलडोजर इलाज है… या सिर्फ दर्द पर लगाया गया अस्थायी मरहम?”
आप बताइए… रोड खाली होनी चाहिए या ठेले वालों के लिए पहले दूसरी व्यवस्था? 👇

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